शोध से खुलासा : बिगड़ी जैविक घड़ी बढ़ा सकती है आत्महत्या का खतरा, सर्केडियन रिदम और मानसिक स्वास्थ्य के बीच गहरा संबंध सिद्ध

बरेली,12मई । डॉ. अमित कुमार वर्मा (फार्मेसी विभाग, एम.जे.पी. रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय, बरेली) और उनकी बहु-संस्थागत शोध टीम द्वारा किया गया एक ऐतिहासिक समीक्षा अध्ययन मानसिक स्वास्थ्य और सर्केडियन रिदम (जैविक घड़ी) के बीच गहरे संबंध को स्पष्ट करता है।

यह समीक्षा-आधारित शोध विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय शोध-पत्रों का विश्लेषण करते हुए बताता है कि मानव शरीर की आंतरिक समय-प्रणाली न केवल शारीरिक क्रियाओं को नियंत्रित करती है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य, विशेषकर अवसाद, चिंता और आत्महत्या जैसे गंभीर विकारों को भी प्रभावित करती है।
यह शोध प्रतिष्ठित SCI एवं स्कोपस इंडेक्स्ड जर्नल “Behavioural Brain Research” (वॉल्यूम 502, लेख संख्या 116025) में प्रकाशित हुआ है, जो इसकी वैज्ञानिक गुणवत्ता को दर्शाता है।
शोध के मुख्य निष्कर्ष:-
* सर्केडियन रिदम एक 24 घंटे की जैविक प्रणाली है, जो नींद-जागरण चक्र, हार्मोन स्राव, शरीर का तापमान, ऊर्जा स्तर और भावनात्मक स्थिति को नियंत्रित करती है।
·* आधुनिक जीवनशैली (देर रात स्क्रीन का उपयोग, अनियमित नींद, धूप की कमी, शिफ्ट वर्क, तनाव) इस जैविक घड़ी को असंतुलित कर देती है, जिससे नींद की समस्या, चिड़चिड़ापन, तनाव और अवसाद बढ़ता है।
·* सबसे चौंकाने वाला निष्कर्ष: आत्महत्या के विचार और प्रयास दिन के विशेष समयों—विशेषकर देर रात और सुबह के शुरुआती घंटों—में अधिक देखे जाते हैं। शोध ने इसके पीछे जैविक कारणों को भी रेखांकित किया है। इन समयों में मस्तिष्क की सक्रियता में परिवर्तन होता है, नकारात्मक सोच बढ़ती है और भावनात्मक नियंत्रण कमजोर हो जाता है।
·* मस्तिष्क के दो महत्वपूर्ण हिस्सों— सुप्राकियाज़मैटिक न्यूक्लियस (SCN – मास्टर क्लॉक) और लेटरल हैबेनुला (LHb – नकारात्मक भावनाओं का नियंत्रक) —के बीच असंतुलन आत्महत्या का जोखिम बढ़ा सकता है।
·* शोध ने “रिस्क विंडो” की अवधारणा प्रस्तुत की है, जिसके अनुसार दिन के कुछ समय में व्यक्ति मानसिक रूप से अधिक संवेदनशील और निर्णय क्षमता में कमजोर हो जाता है।
उपचारात्मक सुझाव:-
शोध केवल समस्या का विश्लेषण नहीं करता, बल्कि समाधान भी प्रस्तुत करता है:
·* सर्केडियन रिदम को संतुलित रखने के लिए नियमित दिनचर्या, पर्याप्त नींद, सुबह की धूप, स्क्रीन टाइम में कमी, योग और ध्यान को प्रभावी बताया गया है।
·* क्रोनोथेरेपी (समय-आधारित उपचार) जैसे लाइट थेरेपी और नींद प्रबंधन को महत्वपूर्ण बताया गया है।

कुलपति जी का वक्तव्य:-
इस उल्लेखनीय उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए, माननीय कुलपति प्रो. के. पी. सिंह ने कहा:-
“यह समीक्षा शोध मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक मील का पत्थर है। डॉ. अमित कुमार वर्मा और उनकी टीम ने यह सिद्ध करके एक महत्वपूर्ण कार्य किया है कि आत्महत्या जैसे गंभीर मुद्दे के पीछे केवल सामाजिक कारण ही नहीं, बल्कि हमारी जैविक घड़ी भी जिम्मेदार हो सकती है। इस शोध से न केवल मानसिक रोगों की रोकथाम में नए दृष्टिकोण विकसित होंगे, बल्कि समय-आधारित उपचार विधियों को भी बल मिलेगा। मैं पूरी शोध टीम को हार्दिक बधाई देता हूँ और भविष्य में ऐसे और शोध कार्यों के लिए उन्हें प्रेरित करता हूँ।”
शोध टीम के सदस्य:-
·* मुख्य शोधकर्ता: डॉ. अमित कुमार वर्मा (एम.जे.पी. रोहिलखंड विश्वविद्यालय, बरेली)
·* डॉ. अंगुबाला गणेश के.एस.वी. (अडानी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, गुजरात)
·* डॉ. श्रेया एस.ए. (पीएसजी कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड साइंस, कोयंबटूर)
·* डॉ. सुजीत शेखर मिश्रा (अपोलो मेडिक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल्स, लखनऊ)
·* डॉ. रेवती बोयपना (क्यूआईएस कॉलेज ऑफ फार्मेसी, ओंगोल)
·* डॉ. श्रेया कोसनके (डॉ. एम.जी.आर. एजुकेशनल एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट, चेन्नई)
यह समीक्षा शोध मानसिक स्वास्थ्य को समझने और आत्महत्या जैसे गंभीर विकारों की रोकथाम के लिए एक नया वैज्ञानिक आयाम प्रदान करता है।
बरेली से अखिलेश चन्द्र सक्सेना की रिपोर्ट
