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लिखित समझौते पर बढ़ा बवाल! आंदोलन खत्म होने के बाद CJP को क्यों सता रहा सबसे बड़ी चूक का डर?

नई दिल्ली: जंतर-मंतर पर 36 दिनों तक चले छात्र आंदोलन को 25 जुलाई को सरकार के साथ बनी सहमति के बाद समाप्त करने वाली कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) अब एक बार फिर सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगा रही है। विवाद की मुख्य वजह वह लिखित आश्वासन है, जिसे लेकर संगठन का दावा है कि समझौते के बावजूद अब तक कोई आधिकारिक दस्तावेज उन्हें नहीं सौंपा गया है।

संगठन का कहना है कि यदि आंदोलन के दौरान दर्ज मुकदमे वापस नहीं लिए गए और गिरफ्तार प्रदर्शनकारियों को पूरी राहत नहीं मिली तो वह दोबारा आंदोलन का रास्ता अपना सकता है।

समझौते के बाद कैसे बढ़ा विवाद?

20 जून को शिक्षा व्यवस्था में सुधार और तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर शुरू हुआ आंदोलन 25 जुलाई को समाप्त हुआ था। सरकार की ओर से केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह ने वार्ता की थी, जबकि CJP की ओर से सौरव दास और आशुतोष रांका शामिल हुए थे।

बैठक के बाद दोनों पक्षों ने मीडिया के सामने कहा था कि आंदोलन के दौरान दर्ज मामलों में राहत देने, भविष्य में प्रतिशोधात्मक कार्रवाई नहीं करने और अन्य मांगों पर सहमति बनी है। इसके बाद CJP ने अपना धरना समाप्त करने की घोषणा कर दी थी।

बिहार और असम में शुरू हुई कार्रवाई

समझौते के बाद सरकार ने बिहार और असम में आंदोलन से जुड़े कई मामलों को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की। बिहार के 20 जिलों में दर्ज 64 मुकदमों और असम के पांच मामलों में कार्रवाई शुरू की गई। इसके साथ ही कुछ गिरफ्तार प्रदर्शनकारियों की रिहाई की प्रक्रिया भी शुरू हुई।

हालांकि, CJP का आरोप है कि पूरे देश में एक समान कार्रवाई नहीं हुई है और समझौते का लिखित रिकॉर्ड भी अब तक उपलब्ध नहीं कराया गया है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बढ़ी चिंता

मामले ने नया मोड़ तब लिया जब सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस कार्रवाई से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान जांच जारी रखने की अनुमति देते हुए कहा कि निर्दोष लोगों की गिरफ्तारी न की जाए। अदालत ने केंद्र सरकार और संबंधित राज्यों से अगली सुनवाई में अपना पक्ष रखने को भी कहा है।

CJP का कहना है कि यदि सरकार अदालत के समक्ष समझौते का उल्लेख नहीं करती है तो प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों की जांच आगे भी जारी रह सकती है।

CJP ने सरकार से क्या मांग की?

CJP नेता सौरव दास का कहना है कि 25 जुलाई की बैठक में मुकदमे वापस लेने और भविष्य में किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं करने का भरोसा दिया गया था। उनका दावा है कि 28 जुलाई तक लिखित दस्तावेज उपलब्ध कराने की बात भी कही गई थी, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हुआ।

उन्होंने कहा कि यदि सरकार अपने आश्वासन से पीछे हटती है और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई जारी रहती है तो संगठन छात्रों के समर्थन में फिर से आंदोलन शुरू करने पर विचार करेगा।

लिखित समझौते पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आंदोलन समाप्त करते समय CJP ने सरकार के मौखिक आश्वासन पर भरोसा किया। अब जबकि मामला न्यायालय तक पहुंच चुका है, संगठन लिखित समझौता नहीं होने को अपनी सबसे बड़ी कमजोरी मान रहा है।

इसी कारण विपक्ष और कई राजनीतिक जानकार यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या आंदोलन समाप्त करने से पहले CJP को औपचारिक लिखित समझौता अपने पास सुरक्षित कर लेना चाहिए था।

25 जुलाई को क्या कहा था दोनों पक्षों ने?

वार्ता के बाद केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने कहा था कि प्रदर्शनकारियों से जुड़े मामलों, भविष्य में कार्रवाई नहीं करने और अन्य मांगों पर सकारात्मक सहमति बनी है। वहीं CJP नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका ने भी सार्वजनिक रूप से घोषणा की थी कि सरकार के आश्वासन के आधार पर आंदोलन तत्काल प्रभाव से समाप्त किया जा रहा है।

अब आगे क्या होगा?

फिलहाल बिहार और असम में केस वापस लेने की प्रक्रिया जारी है और कई प्रदर्शनकारियों को राहत भी मिल चुकी है। हालांकि, अन्य राज्यों की स्थिति, सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई और सरकार की आगे की रणनीति पर सभी की नजर बनी हुई है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार CJP को लिखित आश्वासन देगी या आंदोलन से जुड़े मामलों पर अंतिम स्थिति अदालत की प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगी।

 

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