बीबीएयू में ‘जैव हरित’ उद्यम की शुरुआत, विद्यार्थियों ने तैयार की 2 हजार किलो वर्मीकम्पोस्ट; पहले दिन 80 किलो की बिक्री

इस पहल का उद्देश्य जैविक कचरे को उपयोगी और बाजार में बिकने वाले उत्पाद यानी वर्मीकम्पोस्ट में बदलना है। उद्यम को डॉ. जीवन सिंह और प्रो. शिखा के मार्गदर्शन में संचालित किया जा रहा है। उद्घाटन के दौरान कुलपति ने विद्यार्थियों को नए विचारों पर काम करने और व्यावहारिक व शोध आधारित गतिविधियों के जरिए उद्यमशीलता कौशल विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया।
विश्वविद्यालय परिसर के पत्तों और गोबर से तैयार हुई खाद
‘जैव हरित’ के तहत वर्मीकम्पोस्ट की पहली खेप विश्वविद्यालय परिसर में एकत्रित सूखी पत्तियों और गोबर से तैयार की गई। इस प्रक्रिया से कुल 2,000 किलोग्राम वर्मीकम्पोस्ट तैयार हुई। इसमें से 300 किलोग्राम खाद बिक्री के लिए पैक की गई, जबकि कार्यक्रम के दौरान 80 किलोग्राम की बिक्री हुई।
विद्यार्थियों की टीम ने संभाली उद्यम की जिम्मेदारी
इस पहल को विद्यार्थियों की टीम ने मिलकर साकार किया। टीम में रोशनी बजाज, पूजा अडवानी, दीपिका मिश्रा, गौरव सिंह रौतेला, अमन, नरेश और हर्षिका शामिल रहे। डॉ. जीवन सिंह और प्रो. शिखा के मार्गदर्शन में विद्यार्थियों ने खाद तैयार करने से लेकर उसकी पैकेजिंग और बिक्री तक की प्रक्रिया में भागीदारी की।
विश्वविद्यालय के शिक्षकों और कर्मचारियों ने दिखाई रुचि

‘जैव हरित’ उत्पाद को विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों, विद्यार्थियों और अन्य सदस्यों से उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिली। प्रमुख खरीदारों में प्रो. सुनीता मिश्रा ने 26 किलोग्राम और प्रो. शालिनी अग्रवाल ने 10 किलोग्राम वर्मीकम्पोस्ट खरीदी।
इसके अलावा प्रो. शिखा, प्रो. सुभाष मिश्रा, प्रो. नवीन कुमार अरोड़ा, डॉ. मोनिका शर्मा और प्रो. मधुलिका दुबे समेत विश्वविद्यालय के कई अन्य सदस्यों ने भी उत्पाद में रुचि दिखाई और इसकी खरीद की। विश्वविद्यालय समुदाय की भागीदारी से परिसर में तैयार जैविक खाद की व्यावसायिक संभावनाओं को बढ़ावा मिला है।
उद्यमिता के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी मिलेगा बढ़ावा
‘जैव हरित’ की शुरुआत को बीबीएयू में विद्यार्थियों के नेतृत्व में उद्यम स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इस पहल से विद्यार्थियों को उत्पाद तैयार करने, पैकेजिंग, विपणन और ग्राहकों से संवाद करने का व्यावहारिक अनुभव मिल रहा है।
इसके साथ ही विश्वविद्यालय परिसर में निकलने वाले जैविक अपशिष्ट को उपयोगी खाद में बदलकर उसका व्यावसायिक इस्तेमाल करने की संभावनाएं भी सामने आई हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन के प्रोत्साहन और परिसर के लोगों की सकारात्मक प्रतिक्रिया से इस उद्यम के भविष्य में विस्तार की उम्मीद जगी है।
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