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कर्नाटक में सिद्धारमैया का बड़ा सियासी मास्टरस्ट्रोक, इस्तीफे की चर्चाओं के बीच जाति जनगणना रिपोर्ट को दी मंजूरी

बेंगलुरु: कर्नाटक की राजनीति में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों के बीच मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने बड़ा राजनीतिक दांव चलते हुए राज्य की बहुचर्चित जातिगत जनगणना रिपोर्ट को आधिकारिक मंजूरी दे दी है। माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री पद छोड़ने की चर्चाओं के बीच लिया गया यह फैसला सामाजिक न्याय की राजनीति और अपने पारंपरिक वोट बैंक को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा है।

बुधवार को कर्नाटक पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष मधुसूदन नायक ने सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक सर्वेक्षण से जुड़ी रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंपी। राज्य में इसी रिपोर्ट को जाति जनगणना रिपोर्ट के तौर पर देखा जा रहा है। रिपोर्ट को मंजूरी मिलने के बाद कर्नाटक की राजनीति में नई हलचल शुरू हो गई है।

नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों के बीच बड़ा फैसला

कांग्रेस के भीतर लंबे समय से नेतृत्व परिवर्तन को लेकर चर्चाएं तेज हैं। राजनीतिक गलियारों में यह अटकलें लगातार लगाई जा रही हैं कि डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। ऐसे माहौल में सिद्धारमैया का यह कदम केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि बड़ा राजनीतिक संदेश माना जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सिद्धारमैया अपने पुराने सामाजिक समीकरण ‘अहिंदा’ को मजबूत कर भविष्य की राजनीति में अपनी पकड़ बनाए रखना चाहते हैं।

क्या है ‘अहिंदा’ राजनीति?

कर्नाटक की राजनीति में ‘अहिंदा’ शब्द बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसका संबंध समाज के तीन बड़े वर्गों से है, जिनमें अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित समुदाय शामिल हैं।

सिद्धारमैया लंबे समय से इसी सामाजिक समीकरण के आधार पर राजनीति करते रहे हैं। माना जा रहा है कि जातिगत सर्वे रिपोर्ट को मंजूरी देकर उन्होंने खुद को सामाजिक न्याय के सबसे बड़े चेहरे के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की है।

मुख्यमंत्री ने रिपोर्ट स्वीकार करने के बाद कहा कि जब वह पहली बार मुख्यमंत्री बने थे, तभी इस सर्वे की शुरुआत हुई थी। अब रिपोर्ट को मंजूरी मिलने पर उन्होंने संतोष जताया और उम्मीद व्यक्त की कि यह सामाजिक न्याय लागू करने में अहम आधार साबित होगी।

वर्षों से विवादों में रहा जातिगत सर्वे

कर्नाटक में जातिगत सर्वे का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक विवाद का केंद्र बना हुआ है। सिद्धारमैया के पहले कार्यकाल में इसकी शुरुआत हुई थी, लेकिन सरकार बदलने और राजनीतिक विरोध के कारण यह प्रक्रिया वर्षों तक अटकी रही।

इससे पहले आयोग की एक रिपोर्ट पर वोक्कालिगा और लिंगायत समुदाय के कई नेताओं ने सवाल उठाए थे। उनका आरोप था कि सर्वे के आंकड़े पुराने और अवैज्ञानिक हैं। विवाद बढ़ने के बाद राज्य सरकार ने नया आयोग गठित कर दोबारा सर्वे करवाया।

अब नई रिपोर्ट को मंजूरी मिलने के बाद राज्य की राजनीति में बहस और तेज हो गई है।

विपक्ष ने कांग्रेस सरकार को घेरा

विपक्षी दलों ने कांग्रेस सरकार पर जातीय राजनीति करने का आरोप लगाया है। आर अशोक ने कहा कि सरकार प्रशासनिक विफलताओं और पार्टी के अंदर चल रहे सत्ता संघर्ष से ध्यान हटाने के लिए जाति सर्वे का मुद्दा उठा रही है।

हालांकि कांग्रेस समर्थक इसे सामाजिक प्रतिनिधित्व और संसाधनों के बेहतर वितरण की दिशा में अहम कदम बता रहे हैं।

राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है असर

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कर्नाटक का यह फैसला राष्ट्रीय राजनीति में भी नई बहस छेड़ सकता है। राहुल गांधी लगातार देशभर में जातिगत जनगणना की मांग उठा चुके हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि कर्नाटक मॉडल को आधार बनाकर अन्य राज्यों में भी सामाजिक और आर्थिक सर्वे की मांग तेज हो सकती है।

विशेषज्ञों के मुताबिक आने वाले समय में जातिगत जनगणना का मुद्दा केवल कर्नाटक तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राष्ट्रीय चुनावी राजनीति का बड़ा विषय बन सकता है।

 

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