भू-जल संरक्षण पर बीबीएयू में विशेष व्याख्यान, विशेषज्ञ बोले- आने वाली पीढ़ियों के लिए जल बचाना सामूहिक जिम्मेदारी

लखनऊ: भू-जल सप्ताह के अवसर पर बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू) में “आने वाली पीढ़ियों हेतु सुरक्षित जल: एक सामूहिक जिम्मेदारी” विषय पर विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन मानव विकास एवं परिवार अध्ययन विभाग, बीबीएयू और राज्य संग्रहालय, लखनऊ, संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। इस दौरान जल संरक्षण, भू-जल पुनर्भरण और पर्यावरण संरक्षण को लेकर विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए।

कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने की, जबकि मुख्य अतिथि एवं वक्ता के रूप में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार के अपर निदेशक डॉ. ए.के. गुप्ता मौजूद रहे। कार्यक्रम में राज्य संग्रहालय, लखनऊ के निदेशक डॉ. विनय कुमार सिंह और गृह विज्ञान विद्यापीठ की संकायाध्यक्ष प्रो. यूवी किरण भी उपस्थित रहीं। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन और डॉ. भीमराव अम्बेडकर के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। अतिथियों का पौधा भेंटकर स्वागत किया गया। मंच संचालन डॉ. मोनिका शर्मा ने किया।
जल संकट पूरी दुनिया के लिए गंभीर चुनौती: कुलपति
कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने कहा कि वर्तमान समय में जल संकट केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के सामने एक गंभीर चुनौती बनकर उभरा है। उन्होंने कहा कि बढ़ती जनसंख्या, अनियंत्रित भू-जल दोहन और जल स्रोतों के प्रदूषण के कारण जल संरक्षण पहले से अधिक जरूरी हो गया है। उन्होंने वर्षा जल संचयन, भू-जल पुनर्भरण और जल संरक्षण को जनआंदोलन बनाने की आवश्यकता पर बल दिया।
उन्होंने हरित विकास, नदियों के पुनर्जीवन और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को देश की दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा से जोड़ते हुए सभी से पर्यावरण संरक्षण और जल बचाने के लिए सामूहिक भागीदारी का आह्वान किया।
पारंपरिक और आधुनिक तकनीकों के समन्वय पर दिया जोर
मुख्य वक्ता डॉ. ए.के. गुप्ता ने कहा कि दुनिया में पेयजल के उपलब्ध स्रोत लगातार घट रहे हैं, इसलिए वैज्ञानिक तकनीकों के साथ पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों को भी अपनाना आवश्यक है। उन्होंने वर्षा जल संचयन और भू-जल पुनर्भरण को बढ़ावा देने पर जोर देते हुए केंद्र सरकार की नमामि गंगे सहित विभिन्न जल संरक्षण पहलों का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले अपशिष्ट जल स्रोतों को प्रदूषित कर रहे हैं, इसलिए नियामक संस्थाओं को अधिक प्रभावी निगरानी करनी चाहिए। उन्होंने मिशन लाइफ (LiFE) अभियान के तहत पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली अपनाने और जल संरक्षण को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाने की अपील भी की। साथ ही उन्होंने आर्द्रभूमियों के महत्व और उनके संरक्षण की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला।

प्राचीन जल प्रबंधन प्रणालियों से सीख लेने की जरूरत
राज्य संग्रहालय, लखनऊ के निदेशक डॉ. विनय कुमार सिंह ने कहा कि भारत की प्राचीन संस्कृति में जल संरक्षण को हमेशा विशेष महत्व दिया गया है। उन्होंने गुजरात के धोलावीरा नगर की वर्षा जल संचयन प्रणाली का उदाहरण देते हुए कहा कि पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियां आज भी प्रेरणादायक हैं और आधुनिक तकनीकों के साथ उनका समन्वय समय की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि जल संरक्षण केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए समाज की सक्रिय भागीदारी भी जरूरी है।
वृक्षारोपण और प्रदर्शनी भी बनी आकर्षण का केंद्र
कार्यक्रम के दौरान विश्वविद्यालय परिसर में वृक्षारोपण किया गया। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश राज्य संग्रहालय की ओर से जल संरक्षण और जल संस्कृति पर आधारित विशेष प्रदर्शनी भी लगाई गई। कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल सहित सभी अतिथियों ने प्रदर्शनी का अवलोकन किया और इसे जनजागरूकता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया।
कार्यक्रम के अंत में अतिथियों को स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया। राज्य संग्रहालय की सहायक निदेशक डॉ. अल शाज़ फातमी ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर प्रो. सुनीता मिश्रा, प्रो. शालिनी अग्रवाल, विभिन्न संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, शिक्षक, कर्मचारी, शोधार्थी और बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।
