मृत्यु के बाद नाक-कान में रुई क्यों लगाई जाती है? जानिए इसके पीछे का वैज्ञानिक और धार्मिक कारण
नई दिल्ली: किसी व्यक्ति के निधन के बाद अंतिम संस्कार की तैयारियों के दौरान नाक, कान और कई बार मुंह में भी रुई लगाई जाती है। यह दृश्य लगभग हर अंतिम संस्कार में देखने को मिलता है। कई लोग इसे केवल परंपरा या धार्मिक प्रथा मानते हैं, लेकिन इसके पीछे वैज्ञानिक, चिकित्सीय और व्यावहारिक कारण भी जुड़े हुए हैं।
मृत्यु के बाद शरीर में शुरू होते हैं कई बदलाव

विशेषज्ञों के अनुसार, मृत्यु के कुछ समय बाद मानव शरीर में जैविक परिवर्तन शुरू हो जाते हैं। शरीर की विभिन्न प्रक्रियाएं बंद होने के बाद अंदर मौजूद ऊतकों और पाचन तंत्र में प्राकृतिक विघटन की प्रक्रिया चलने लगती है। इसी दौरान विभिन्न प्रकार की गैसें बनने लगती हैं, जो शरीर के भीतर दबाव पैदा कर सकती हैं।
तरल पदार्थों के रिसाव को रोकने में मिलती है मदद
फोरेंसिक विज्ञान से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि मृत्यु के बाद शरीर की मांसपेशियां धीरे-धीरे शिथिल हो जाती हैं। इसके कारण कुछ तरल पदार्थ नाक, मुंह या अन्य प्राकृतिक छिद्रों से बाहर निकल सकते हैं। नाक और कान में रुई लगाने से ऐसे रिसाव को नियंत्रित करने में मदद मिलती है और शव को सम्मानजनक स्थिति में रखा जा सकता है।
दुर्गंध और संक्रमण की आशंका होती है कम
रुई लगाने का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य दुर्गंध के प्रसार को कम करना भी माना जाता है। इससे शरीर से निकलने वाले तरल पदार्थ और गैसें सीमित रहती हैं, जिससे आसपास का वातावरण अपेक्षाकृत सुरक्षित बना रहता है। साथ ही मक्खियों, कीड़ों और अन्य संभावित संक्रमणकारी तत्वों से भी कुछ हद तक सुरक्षा मिलती है।
दुनिया के कई देशों में अपनाई जाती है यह प्रक्रिया
शव संरक्षण और अंतिम संस्कार की तैयारियों के दौरान इस प्रकार की प्रक्रियाएं केवल भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों में भी अपनाई जाती हैं। इसका उद्देश्य शव की स्थिति को व्यवस्थित बनाए रखना और सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी सावधानियां बरतना होता है।

धार्मिक मान्यताओं से भी जुड़ी है परंपरा
वैज्ञानिक कारणों के अलावा इस परंपरा का धार्मिक पक्ष भी है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, मृत्यु के बाद शरीर के खुले अंगों और द्वारों को बंद करने की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है। धार्मिक ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है और इसे अंतिम संस्कार की प्रक्रिया का एक हिस्सा माना जाता है।
तुलसी के पत्तों का भी किया जाता है उपयोग
कई स्थानों पर रुई के साथ या उसके स्थान पर तुलसी के पत्तों का भी उपयोग किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि तुलसी पवित्र मानी जाती है और यह वातावरण की शुद्धता से जुड़ी प्रतीकात्मक भूमिका निभाती है। इसी कारण अंतिम संस्कार की कई परंपराओं में इसका विशेष महत्व माना जाता है।
परंपरा और विज्ञान का अनूठा संगम
विशेषज्ञों के अनुसार, मृत्यु के बाद नाक और कान में रुई लगाने की परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे व्यावहारिक और वैज्ञानिक कारण भी मौजूद हैं। यही वजह है कि यह प्रक्रिया आज भी अंतिम संस्कार की तैयारियों का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है।
