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दक्षिण भारत में हिंदी को लेकर बड़ा बयान, डॉ. आरसु बोले- इसे न सीखने वाला कूपमंडूक बनकर रह जाएगा

गोंडा: भारत को उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक जोड़ने वाली भाषा हिंदी है। देश में हिंदी न सीखने वाला व्यक्ति कूपमंडूक बनकर रह जाएगा। यह बात भाषा समन्वय वेदी (केरल) के अध्यक्ष और कालिकट विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. आरसु ने कही। वह बुधवार को श्रीलाल बहादुर शास्त्री डिग्री कॉलेज के ललिता शास्त्री सभागार में ‘दक्षिण भारत में हिंदी’ विषय पर आयोजित गोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम का आयोजन पूर्वापर, हिंदी विभाग और आईक्यूएसी के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।

विविधता में एकता पर दिया जोर

डॉ. आरसु ने कहा कि बंगाल के निवासी रवींद्रनाथ टैगोर और गुजरात के निवासी दयानंद सरस्वती ने अपनी प्रमुख रचनाएं मातृभाषा के बजाय हिंदी में लिखीं। उन्होंने कहा कि विविधता में एकता और प्रतिकूलता में अनुकूलता बनाना हमारा धर्म होना चाहिए। डॉ. आरसु ने लेखन में मानवीय दृष्टि अपनाने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि प्यार और नफरत दोनों एक साथ नहीं चल सकते।

‘गंगा कावेरी संगमम्’ बताया कार्यक्रम

कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन और मां सरस्वती की प्रतिमा पर पुष्पार्चन के साथ हुई। हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. जयशंकर तिवारी ने कार्यक्रम को ‘गंगा कावेरी संगमम्’ बताते हुए अतिथियों का स्वागत किया। प्राचार्य प्रो. जितेंद्र सिंह ने कहा कि उत्तर और दक्षिण के इस मिलन से भाषाओं को मजबूती मिलेगी। कार्यक्रम का संचालन डॉ. सूर्यपाल सिंह ने किया।

दक्षिण भारत से आए हिंदी विद्वानों का सम्मान

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कार्यक्रम में केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश से आए हिंदी विद्वानों प्रो. सीके वाणिदेवी, डॉ. रतीश निराला, प्रो. पी. गीता, संजय कुमार पीएस, कुंजिकणारन ओ, डॉ. सलमी सत्यार्थी, डॉ. ओ. वासवन, डॉ. एमके प्रीता, डॉ. बी. विजयकुमार, डॉ. श्रीजा प्रमोद, डॉ. राजेंद्रन कोयिक्कल, पीए अजयन, आखिला ए, डॉ. एसए मंजूनाथ और डॉ. के जयलक्ष्मी का सम्मानपत्र, अंगवस्त्र और स्मृति चिन्ह देकर स्वागत किया गया।

कई पुस्तकों का किया गया विमोचन

इस अवसर पर कई पुस्तकों का विमोचन भी किया गया। इनमें गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों के लेखकों की रचनाओं पर केंद्रित आलेख संग्रह ‘पूर्वापर’, अवधेश सिंह अवधेश की ‘मगनमन बदरा’, घनश्याम पांडेय की ‘कौआ रोर’, रमाकांत सिंह शेष की ‘गीत ये तेरे लिए हैं’, ‘मुक्तक मानस’ और ‘सबमें जोत, जोत है सोई’ सहित तीन पुस्तकें, किरन सिंह की ‘अनोखी चुलबुली दुनिया’, डॉ. महेश की ‘सर्द हवाओं के दिन’ और गणेश प्रसाद तिवारी की ‘ऋग्वेद की सूक्तियां’ शामिल हैं।

ये लोग रहे मौजूद

कार्यक्रम में श्रीमान सिंह, प्रो. शैलेंद्र मिश्र, प्रो. अमन चंद्रा, डॉ. चमन कौर, प्रो. मंशाराम वर्मा, देवनाथ द्विवेदी, शिवाकांत मिश्र, घनश्याम अवस्थी, राजेश ओझा, प्रो. महराजदीन पांडेय, डॉ. संदीप श्रीवास्तव, बृजलाल तिवारी, राणा प्रताप राही, डॉ. संतशरण त्रिपाठी, डॉ. मनोज मिश्र, डॉ. पवन सिंह, कृष्णनंदन तिवारी, उमाशंकर शुक्ल, प्रो. शिवशरण शुक्ल, प्रो. रंजन शर्मा, डॉ. नीरज पांडेय और मुक्ता टंडन समेत अन्य लोग मौजूद रहे।

 

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