Saturday, April 25, 2026
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आईवीआरआई में कृषि विज्ञान केन्द्र की 29वीं वैज्ञानिक सलाहकार समिति की बैठक का आयोजन 

बरेली,23अप्रैल।भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, (आईवीआरआई) में आज कृषि विज्ञान केन्द्र की 29वीं वैज्ञानिक सलाहकार समिति की बैठक  का आयोजन किया गया जिसमें वर्ष 2025 की बैठक की समीक्षा तथा परिपालन तथा आगामी वर्ष 2026 की कार्ययोजना पर विस्तृत चर्चा की गयी। इस बैठक में निदेशक, अटारी सहित उत्तर प्रदेश सरकार के विभिन्न विभागों के संयुक्त निदेशकों सहित अधिकारियों ने भाग लिया।
बैठक के उद्घाटन अवसर पर बोलते हुये संस्थान के निदेशक डा. राघवेन्द्र भट्टा ने कहा कि आईवीआरआई स्थित कृषि विज्ञान केन्द्र बरेली ही नहीं अपितु देश में अपनी कार्य प्रणाली के लिये जाना जाता है। डॉ भट्टा ने आगे बताया कि हमें किसानों की समस्याओं का समाधान करने के साथ साथ उनके अनुभवों तथा उनकी पारम्परिक तकनीकियों का भी संकलन करना होगा साथ ही हमें  किसानों की फील्ड स्तर पर आने वाली चुनौतियों को समझकर उनके समाधान हेतु कार्य करना होगा।
डॉ राघवेन्द्र भट्टा ने कहा कि अनेक किसान विभिन्न योजनाओं एवं सुविधाओं से अनभिज्ञ रहते हैं इसलिए हमें सरकारी योजनाओं की जानकारी के  प्रसार को बढ़ाना होगा  साथ ही उन्होंने कृषि एवं पशुपालन को एकीकृत मॉडल के रूप में अपनाने का सुझाव दिया, जिससे आय के विविध स्रोत विकसित हो सकें और जोखिम कम किया जा सके। इसके साथ ही, जैविक खाद एवं मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया गया।
इस अवसर पर संस्थान की संयुक्त निदेशक प्रसार शिक्षा डा. रूपसी तिवारी ने कृषि विज्ञान केन्द्र बरेली के बारे में बताते हुये कहा कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा वर्ष 1985-86 में  इसे स्वीकृत किया गया था। संस्थान द्वारा कृषि विज्ञान केन्द्र को 13.77 हेक्टेयर भूमि आवंटित की गई तथा वर्ष 1999 में प्रशासनिक भवन की स्थापना के साथ कई प्रदर्शन इकाइयों की स्थापना की गयी जिनमें बीज उत्पादन इकाई, फसल कैफेटेरिया, मशरूम उत्पादन इकाई, मधुमक्खी पालन इकाई, वर्मी कम्पोस्ट इकाई, मछली सह बतख, मछली सह बकरी, मछली सह डेयरी एकीकृत कृषि प्रणाली आदि शामिल हैं। ये सभी मॉडल कृषि विज्ञान केन्द्र के प्रशिक्षण कार्यक्रम ऑन फार्म ट्रायल और अग्रिम पंक्ति प्रदर्शन गतिविधियों का सहयोग करते हैं।
कृषि विज्ञान केंद्रों की भूमिका देश में कृषि एवं पशुपालन क्षेत्र के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अंतर्गत स्थापित कृषि विज्ञान केंद्र नवीन कृषि तकनीकों के प्रदर्शन, किसानों के प्रशिक्षण एवं जागरूकता के प्रमुख केंद्र हैं।
डॉ. तिवारी ने अपने संबोधन में बताया कि केंद्र द्वारा प्रतिवर्ष 100 से अधिक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जबकि 40–50 कार्यक्रम विभिन्न लाइन विभागों के सहयोग से संपन्न होते हैं। इन प्रशिक्षणों में डेयरी, बकरी पालन, सूकर पालन, मधुमक्खी पालन, मशरूम उत्पादन एवं अन्य कृषि-आधारित उद्यमों को शामिल किया जाता है। इसके साथ ही कौशल विकास कार्यक्रमों के माध्यम से किसानों एवं युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं।
उन्होंने बताया कि केंद्र के वैज्ञानिक जनपद के सभी 15 विकास खंडों में सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं तथा विभिन्न विभागों के साथ समन्वय स्थापित कर किसानों तक तकनीकी जानकारी पहुंचा रहे हैं। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप अब तक कई प्रगतिशील किसान तैयार हुए हैं, जो वर्मी कम्पोस्ट, सब्जी, फल एवं शहद जैसे उत्पादों का उत्पादन कर अन्य प्रदेशों में भी विपणन कर रहे हैं। डॉ तिवारी ने कहा कि बीज उत्पादन के क्षेत्र में भी केंद्र की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। प्रतिवर्ष गेहूं, धान एवं सरसों आदि फसलों का बीज उत्पादन कर राष्ट्रीय बीज निगम को उपलब्ध कराया जाता है। इस वर्ष केंद्र द्वारा विभिन्न उत्पादों के विक्रय से लगभग 9.30 लाख रुपये की आय अर्जित की गई है। उन्होंने आगे कहा कि कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा आईसीटी माध्यमों जैसे व्हाट्सएप, किसान साथी ऐप एवं दूरभाष के जरिए किसानों को समय-समय पर आवश्यक सलाह प्रदान की जाती है।
वैज्ञानिक सलाहकार समिति की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए डॉ. तिवारी ने कहा कि यह समिति केंद्र की गतिविधियों की समीक्षा कर भविष्य की कार्ययोजना तैयार करने में महत्वपूर्ण योगदान देती है। इसके माध्यम से वैज्ञानिकों, विभागों एवं किसानों के बीच समन्वय स्थापित होता है, जिससे अनुसंधान एवं प्रसार के बीच की दूरी कम होती है।
अपने संबोधन में डॉ. राघवेन्द्र सिंह, निदेशक, अटारी, कानपुर ने केंद्र की गतिविधियों की सराहना करते हुए इसे प्रभावी एवं समावेशी मंच बताया। उन्होंने कहा कि इस बैठक में विभिन्न हितधारकों—राज्य प्रतिनिधि, नाबार्ड, प्रगतिशील किसान, युवा एवं महिला किसान—की सक्रिय भागीदारी इसकी सफलता को दर्शाती है।
डॉ. सिंह ने कहा कि अनुसंधान संस्थानों से जुड़े कृषि विज्ञान केंद्रों की प्रमुख शक्ति उनकी तकनीकी सुदृढ़ता है, जिसे किसानों तक प्रभावी रूप से पहुंचाना आवश्यक है। उन्होंने जोर दिया कि वर्तमान में कृषि प्रणाली अत्यंत गतिशील है, इसलिए वैज्ञानिकों एवं किसानों को तेजी से बदलती परिस्थितियों के अनुरूप अनुकूलन अपनाना होगा।
उन्होंने विशेष रूप से फर्टिलाइजर मैनेजमेंट अभियान को प्राथमिकता देते हुए फसल आधारित योजनाओं के निर्माण पर बल दिया। साथ ही ग्रीन मैन्योरिंग, एकीकृत कृषि प्रणाली तथा पशुपालन आधारित अपशिष्ट प्रबंधन को कार्ययोजना में शामिल करने की आवश्यकता बताई, जिससे न्यूनतम संसाधनों के साथ अधिकतम उत्पादन प्राप्त किया जा सके।
कृषि विज्ञान केन्द्र के विभागाध्यक्ष डॉ. एच.आर. मीणा ने बैठक में गत वर्ष की गतिविधियों को प्रस्तुत किया इसके साथ ही उन्होंने बताया कि आगामी वर्ष में कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा फसल उत्पादन, उद्यान, मृदा स्वास्थ्य, पशुधन उत्पादन एवं प्रबन्धन, गृह विज्ञान/ महिला सशक्तिकरण, कृषि अभियांत्रिकी, पौध उत्पादन, मत्स्य पालन सम्बन्धी विविध कार्यक्रम किये जायेंगे। इसके अतिरिक्त किसान मेला एवं पशु स्वास्थ्य शिविर आदि का आयोजन किया जायेगा।
कार्यक्रम का संचालन कृषि विज्ञान केन्द्र के डॉ. एच आर.मीणा द्वारा किया गया जबकि धन्यवाद ज्ञापन डा. रंजीत सिंह द्वारा दिया  गया। इस अवसर पर संस्थान के संयुक्त निदेशक शोध, डॉ एस के सिंह  संयुक्त निदेशक,  शैक्षणिक  डॉ. एस.के. मेंदीरत्ता,  संयुक्त निदेशक कृषि के प्रतिनिधि डॉ. अमरपाल, मुख्य जिला पशु चिकित्सा अधिकारी के प्रतिनिधि, डिप्टी डायरेक्टर कृषि डॉ. हिमांशु पांडे, डीडीएम नाबार्ड श्री अभिषेक मिश्रा, आकाशवाणी बरेली के केंद्र निदेशक श्री मिथिलेश श्रीवास्तव, उपनिदेशक मत्स्य के प्रतिनिधि श्रीमती अंजना यादव, कृभको के क्षेत्रीय प्रबंधक श्री सूरज शुक्ला एवं एन एफ एल के क्षेत्रीय सेल्स प्रबंधक श्री रिजवान खान आदि के साथ-साथ जनपद के प्रगतिशील कृषक भी उपस्थित थे। इफ्को, बैंक, मृदा संरक्षण सहित कृभको, नाबार्ड, आकाशवाणी आदि सहित संस्थान के कृषि विज्ञानं केंद्र के डॉ. आर एल सागर, डॉ. रंजीत सिंह, डॉ. शार्दुल, डॉ नेहा, अमित पिप्पल तथा लक्ष्य यादव सहित विभिन्न विभागों के विभाागाध्यक्षों ने भाग लिया।                                  बरेली से अखिलेश चन्द्र सक्सेना की रिपोर्ट
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