देश

हिमालय पर मंडराया बड़ा जलवायु खतरा! कम बारिश और बढ़ता तापमान बढ़ा सकता है बाढ़, भूस्खलन व ग्लेशियर फटने का जोखिम

नई दिल्ली: मानसून के देशभर में सक्रिय होने के बीच हिंदू कुश हिमालय (एचकेएच) क्षेत्र को लेकर आई नई रिपोर्ट ने वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं की चिंता बढ़ा दी है। ताजा आकलन के अनुसार इस वर्ष मानसून के दौरान इस संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्र में सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना है, जबकि तापमान औसत से अधिक रह सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति कई गंभीर जलवायु और प्राकृतिक आपदाओं को जन्म दे सकती है।

कम बारिश और अधिक गर्मी का दोहरा संकट

इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) और चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज के इंस्टीट्यूट ऑफ एटमॉस्फेरिक फिजिक्स द्वारा जारी ‘एचकेएच मॉनसून आउटलुक 2026’ रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि कम वर्षा और बढ़ते तापमान का संयुक्त प्रभाव सूखा, भूस्खलन, अचानक बाढ़ और ग्लेशियर झील फटने जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ा सकता है।

अल नीनो का असर बिगाड़ सकता है मानसून का संतुलन

रिपोर्ट के अनुसार अल नीनो जैसी मौसमीय परिस्थितियां मानसून के स्वरूप को प्रभावित कर सकती हैं। इससे वर्षा का वितरण असंतुलित हो सकता है, जिसके चलते कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश और कुछ इलाकों में बारिश की कमी देखने को मिल सकती है। यह स्थिति जल संसाधनों और स्थानीय पारिस्थितिकी के लिए चुनौती बन सकती है।

आठ देशों तक फैला है हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र

करीब 3,500 किलोमीटर में फैला हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, चीन और म्यांमार को जोड़ता है। यह क्षेत्र एशिया की कई प्रमुख नदी प्रणालियों का उद्गम स्थल है। गंगा, सिंधु, ब्रह्मपुत्र, यांग्त्जी, मेकांग, इरावदी और अमू दरिया जैसी नदियों का स्रोत यही क्षेत्र है, जिन पर करोड़ों लोगों की जल, कृषि और आजीविका संबंधी जरूरतें निर्भर हैं।

कम बर्फबारी से बढ़ी जल संकट की आशंका

विशेषज्ञों के अनुसार पिछले शीतकाल में बर्फ का टिकाव सामान्य से कम रहा। इसका मतलब है कि यह क्षेत्र इस बार अपेक्षाकृत कम जल भंडार के साथ मानसून में प्रवेश कर रहा है। ऐसी स्थिति में स्थानीय आबादी को वर्षा, भूजल और प्राकृतिक जल स्रोतों पर अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है। यदि मानसून अपेक्षा से कमजोर रहा तो जल उपलब्धता पर भी असर पड़ सकता है।

कम बारिश का मतलब कम खतरा नहीं

रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि कम वर्षा का अर्थ यह नहीं है कि प्राकृतिक आपदाओं का खतरा घट जाएगा। कम समय में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं भी बड़े पैमाने पर तबाही ला सकती हैं। अचानक बाढ़, पहाड़ी ढलानों का खिसकना और ग्लेशियर झीलों का फटना ऐसे खतरे हैं, जो कम बारिश वाले मौसम में भी गंभीर रूप ले सकते हैं।

जलवायु परिवर्तन बना बड़ी चिंता

वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्र पहले की तुलना में कहीं अधिक संवेदनशील हो गया है। बढ़ता तापमान और अनिश्चित वर्षा पैटर्न आने वाले वर्षों में क्षेत्र की पारिस्थितिकी, जल संसाधनों और स्थानीय समुदायों पर व्यापक प्रभाव डाल सकते हैं।

विशेषज्ञों ने दी तैयारी बढ़ाने की सलाह

रिपोर्ट में प्रशासन और नीति निर्माताओं से आपदा प्रबंधन, जल संरक्षण और जलवायु अनुकूलन रणनीतियों को मजबूत करने की अपील की गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में होने वाले बदलाव केवल पर्वतीय इलाकों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उनका प्रभाव पूरे दक्षिण एशिया और करोड़ों लोगों के जीवन पर पड़ता है।

 

---------------------------------------------------------------------------------------------------