राफेल डील पर बड़ा अपडेट! ‘मेक इन इंडिया’ की शर्तों पर बनेंगे लड़ाकू विमान, 50% तक स्वदेशी सामग्री की तैयारी
नई दिल्ली: भारत और फ्रांस के बीच बहुप्रतीक्षित राफेल लड़ाकू विमान सौदे को लेकर बड़ी प्रगति की खबर सामने आ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आगामी फ्रांस यात्रा के दौरान इस महत्वपूर्ण रक्षा समझौते पर निर्णायक घोषणा हो सकती है। सूत्रों के मुताबिक, ‘मेक इन इंडिया’ के तहत भारत में राफेल विमानों के निर्माण को लेकर दोनों देशों के बीच बातचीत अंतिम चरण में पहुंच गई है और स्वदेशी सामग्री के इस्तेमाल पर सहमति बनने की संभावना बढ़ गई है।
मोदी की फ्रांस यात्रा पर टिकी निगाहें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 13 से 18 जून के बीच फ्रांस और स्लोवाकिया के दौरे पर रहेंगे। इस दौरान वह जी-7 शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के साथ फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ द्विपक्षीय वार्ता भी करेंगे। इसी बैठक के दौरान राफेल विमान सौदे को लेकर बड़ा ऐलान होने की संभावना जताई जा रही है।
114 राफेल विमानों की खरीद की योजना
भारत ने फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने का निर्णय लिया है। इस रक्षा सौदे की अनुमानित लागत करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये बताई जा रही है। योजना के तहत 18 विमान सीधे फ्रांस से भारत आएंगे, जबकि शेष 96 विमानों का निर्माण भारत में किया जाएगा।
स्वदेशी सामग्री को लेकर अड़ी भारत सरकार
भारत चाहता है कि देश में बनने वाले राफेल विमानों में कम से कम 50 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का उपयोग हो। इसका उद्देश्य रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना और घरेलू रक्षा उद्योग को मजबूत करना है। इससे पहले फ्रांस की ओर से 25 से 30 प्रतिशत स्थानीय सामग्री उपयोग का प्रस्ताव रखा गया था, लेकिन भारत ने स्पष्ट कर दिया था कि ‘मेक इन इंडिया’ की भावना के अनुरूप न्यूनतम 50 प्रतिशत भारतीय सामग्री अनिवार्य होनी चाहिए।
पहले क्यों अटका था समझौता?
फरवरी में फ्रांस की रक्षा मंत्री की भारत यात्रा के दौरान भी इस मुद्दे पर चर्चा हुई थी। उस समय स्थानीय सामग्री के प्रतिशत को लेकर सहमति नहीं बन पाई थी, जिसके चलते समझौते को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका। अब दोनों देशों के बीच इस विषय पर सहमति बनने की संभावना जताई जा रही है।

भारत की जरूरतों के लिए उपयुक्त माना जा रहा राफेल
राफेल को 4.5 पीढ़ी का अत्याधुनिक लड़ाकू विमान माना जाता है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की सामरिक जरूरतों को देखते हुए यह विमान पूरी तरह सक्षम है। उनका मानना है कि भारत की भौगोलिक परिस्थितियों में स्टील्थ तकनीक की आवश्यकता उतनी निर्णायक नहीं है, जितनी लंबी दूरी वाले युद्धक्षेत्रों में होती है।
रूस ने भी दिया सुखोई-57 का प्रस्ताव
राफेल डील के समानांतर रूस ने भारत को अपने पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट सुखोई-57 के संयुक्त उत्पादन और तकनीक हस्तांतरण का प्रस्ताव भी दिया है। रूस का दावा है कि वह बिना किसी तकनीकी प्रतिबंध के भारत के साथ इस विमान के विकास और निर्माण के लिए तैयार है।
4.5 और 5वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों में क्या है अंतर?
4.5 पीढ़ी के विमान
रडार से बचाव के लिए मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग तकनीक का उपयोग करते हैं। इनमें बाहरी हथियार और ईंधन टैंक लगाए जाते हैं। कुछ विमान बिना आफ्टरबर्नर के सुपरसोनिक गति हासिल करने में सक्षम होते हैं। राफेल, एसयू-35 और एफ-15ईएक्स इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
5वीं पीढ़ी के विमान
इनमें उन्नत स्टील्थ तकनीक होती है, जिससे रडार पर पहचान बेहद कठिन हो जाती है। हथियार और ईंधन विमान के भीतर बने विशेष डिब्बों में रखे जाते हैं। ये विमान बिना आफ्टरबर्नर के लगातार सुपरसोनिक गति से उड़ान भर सकते हैं। एफ-35, जे-20 और एसयू-57 इस श्रेणी में आते हैं।
