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भारत की तेल चिंता बढ़ी: कच्चा तेल 10 डॉलर महंगा, रूसी तेल की छूट लगभग खत्म; पेट्रोल-डीजल पर बढ़ सकता है दबाव

नई दिल्ली: भारतीय तेल रिफाइनरियों के लिए कच्चे तेल की खरीद लगातार महंगी होती जा रही है। वैश्विक बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमत पिछले दो हफ्तों में करीब 10 डॉलर प्रति बैरल बढ़कर 91 डॉलर के पार पहुंच गई है। वहीं, कच्चे तेल की सीमित उपलब्धता के कारण खाड़ी और पश्चिम अफ्रीकी तेल पर भी भारी प्रीमियम बढ़ गया है। सबसे बड़ी चिंता रूस से मिलने वाले कच्चे तेल को लेकर है, क्योंकि उस पर मिलने वाली छूट लगभग खत्म हो चुकी है। वेनेजुएला के तेल पर भी पहले की तुलना में कम छूट मिल रही है।

अगर खाड़ी क्षेत्र से तेल की आपूर्ति सामान्य नहीं होती और रूसी तेल पर पुरानी छूट वापस नहीं आती है, तो भारतीय रिफाइनरियों की लागत में और बढ़ोतरी हो सकती है। इसका असर आगे पेट्रोल-डीजल की कीमतों और तेल कंपनियों के मुनाफे पर पड़ सकता है। एक अनुमान के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमत में 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से कंपनियों को करीब 6 रुपये प्रति लीटर का नुकसान हो सकता है।

खाड़ी का कच्चा तेल ब्रेंट से करीब 10 डॉलर तक महंगा

बाजार में आपूर्ति की कमी के बीच भारतीय रिफाइनरियों को खाड़ी देशों से कच्चा तेल खरीदने के लिए हाजिर बाजार का सहारा लेना पड़ रहा है। इस बाजार में कारोबारी अतिरिक्त प्रीमियम की मांग कर रहे हैं।

खाड़ी के तेल आपूर्तिकर्ता दुबई-ओमान बेंचमार्क पर करीब 3 से 4 डॉलर प्रति बैरल का अतिरिक्त प्रीमियम मांग रहे हैं। वहीं, दुबई-ओमान बेंचमार्क खुद ब्रेंट से करीब 6 से 7 डॉलर प्रति बैरल महंगा है। इस तरह भारतीय रिफाइनरियों के लिए खाड़ी का कच्चा तेल ब्रेंट की तुलना में करीब 10 डॉलर प्रति बैरल तक महंगा पड़ रहा है।

सऊदी अरामको की आधिकारिक बिक्री कीमत दुबई-ओमान बेंचमार्क से 1.5 से 3 डॉलर नीचे है, लेकिन लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण तय अनुबंधों के तहत आपूर्ति प्रभावित हुई है। इसके चलते रिफाइनरियों की निर्भरता हाजिर बाजार पर बढ़ गई है।

जहाजों की कमी से बढ़ी तेल पहुंचाने की लागत

संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों से कच्चा तेल लाने के लिए पर्याप्त जहाज उपलब्ध होना भी बड़ी चुनौती बन गया है। जोखिम वाले समुद्री मार्गों और छिपे हुए जहाज बेड़े या जहाज से जहाज में तेल स्थानांतरण के जरिए कच्चा तेल पहुंचाने के लिए कारोबारी अतिरिक्त प्रीमियम मांग रहे हैं।

तय अनुबंधों के तहत मिलने वाला तेल अपेक्षाकृत सस्ता होने के बावजूद जहाजों की कमी के कारण उसे भारत तक पहुंचाने की लागत बढ़ रही है। इससे भारतीय रिफाइनरियों पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव पड़ रहा है।

पश्चिम अफ्रीकी तेल की कीमत भी बढ़ी

खाड़ी के बाद पश्चिम अफ्रीका से मिलने वाला कच्चा तेल भी भारतीय रिफाइनरियों के लिए महंगा हो गया है। ऐसे में तेल कंपनियां आपूर्ति के दूसरे विकल्प तलाश रही हैं।

अमेरिका, ब्राजील और गुयाना जैसे दूर स्थित देशों से कच्चा तेल खरीदने के विकल्प पर भी विचार किया जा रहा है। हालांकि, लंबी दूरी के कारण इन स्रोतों से तेल मंगाने की लागत भी एक महत्वपूर्ण चुनौती बन सकती है।

रूसी तेल की सबसे बड़ी बढ़त अब खत्म

कुछ समय पहले तक रूसी कच्चा तेल भारतीय रिफाइनरियों के लिए सबसे आकर्षक विकल्पों में शामिल था। इसकी प्रमुख वजह रूस से मिलने वाली भारी छूट थी। लेकिन अब यह छूट लगभग खत्म हो चुकी है। वेनेजुएला के कच्चे तेल पर भी डिस्काउंट काफी कम हो गया है।

इससे भारतीय रिफाइनरियों के सामने दोहरी चुनौती पैदा हो गई है। एक ओर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर उन्हें पहले की तरह सस्ता रूसी तेल उपलब्ध नहीं हो रहा है।

अमेरिकी प्रतिबंध बढ़े तो बढ़ सकती है मुश्किल

भारतीय तेल कंपनियों के सामने अमेरिकी प्रतिबंधों का जोखिम भी बना हुआ है। अगर अमेरिका रूसी तेल खरीदने वाले देशों और कंपनियों पर प्रतिबंध और कड़े करता है, तो भारत के लिए रूसी कच्चा तेल खरीदना और मुश्किल हो सकता है।

ऐसी स्थिति में भारतीय रिफाइनरियों को दूसरे देशों से अधिक कीमत पर कच्चा तेल खरीदना पड़ सकता है। इससे उनकी लागत और बढ़ सकती है और इसका दबाव तेल कंपनियों के मार्जिन के साथ-साथ आगे पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर भी पड़ सकता है।

 

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