बीबीएयू में एमीनेंट लेक्चर सीरीज: स्वदेशी अर्थशास्त्र और नवाचार से आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था पर हुआ मंथन

लखनऊ: बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय में 17 सितंबर को एमीनेंट लेक्चर सीरीज समिति की ओर से विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में ‘स्वदेशी अर्थशास्त्र और आत्मनिर्भर भारत: आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का निर्माण’ विषय पर स्वदेशी विचारधारा, नवाचार, उद्यमिता और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था को लेकर विचार-विमर्श हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने की, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में स्वदेशी जागरण मंच से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता श्री अन्नदा शंकर पाणिग्रही मौजूद रहे।

दीप प्रज्वलन और पुष्पांजलि के साथ हुई शुरुआत
कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन और बाबासाहेब के छायाचित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करने के साथ हुई। इसके बाद विश्वविद्यालय कुलगीत का गायन किया गया। आयोजन समिति की ओर से मुख्य अतिथि को पौधा और स्मृति चिन्ह भेंट किया गया। एमीनेंट लेक्चर सीरीज समिति के कार्यवाहक चेयरपर्सन प्रो. सुनील बाबू गोसीपटाला ने उपस्थित अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम के उद्देश्य और रूपरेखा की जानकारी दी। मंच संचालन डॉ. नरेंद्र सिंह ने किया।
आत्मनिर्भर भारत के लिए स्वदेशी विचारधारा को प्राथमिकता जरूरी
कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने कहा कि भारत को विकसित राष्ट्र की दिशा में आगे ले जाने के लिए स्वदेशी विचारधारा को प्राथमिकता देते हुए आत्मनिर्भरता के आधार को मजबूत करना होगा। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भर भारत का निर्माण केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक, तकनीकी और पर्यावरणीय दृष्टि से संतुलित विकास भी जरूरी है।
उन्होंने कहा कि सामाजिक स्तर पर समाज के सभी वर्गों की समान और सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। वहीं पर्यावरणीय दृष्टि से सतत विकास पर विशेष ध्यान देते हुए प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के प्रति संवेदनशील रहना होगा। विकास की प्रक्रिया में आर्थिक प्रगति के साथ सामाजिक समावेशन और पर्यावरण संरक्षण को भी महत्व दिया जाना चाहिए।
अनुसंधान और कौशल विकास से बढ़ेगी वैश्विक प्रतिस्पर्धा
प्रो. राज कुमार मित्तल ने कहा कि विश्व व्यापार में भारत की क्षमता और प्रतिस्पर्धात्मक सामर्थ्य को मजबूत करने के लिए अनुसंधान एवं विकास, बौद्धिक संपदा अधिकार, प्रौद्योगिकी, व्यावसायिक शिक्षा और कौशल विकास को बढ़ावा देना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों को विद्यार्थियों में नवाचार, अनुसंधान, उद्यमिता और कौशल विकास की भावना विकसित करने के साथ उन्हें बदलती तकनीकी और वैश्विक जरूरतों के अनुरूप तैयार करना होगा। शिक्षण संस्थानों, उद्योग, सरकार और युवा शक्ति के सामूहिक प्रयासों से स्वदेशी क्षमता को वैश्विक स्तर पर स्थापित करते हुए आत्मनिर्भर भारत से विकसित भारत के लक्ष्य को साकार किया जा सकता है।
स्वदेशी उत्पादों और स्थानीय संसाधनों को वैश्विक स्तर तक पहुंचाने पर जोर
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मुख्य अतिथि श्री अन्नदा शंकर पाणिग्रही ने कहा कि आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के लिए स्वदेशी विचारधारा, स्वदेशी वस्तुओं और स्वदेशी उत्पादों को प्रोत्साहित करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था और गुरुकुल परंपरा ने ज्ञान, कौशल और उद्यमिता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
उन्होंने कहा कि भारत ने अपनी ज्ञान-संपदा और कौशल के माध्यम से दुनिया के साथ व्यापारिक और आर्थिक संबंध स्थापित किए तथा लंबे समय तक वैश्विक बाजार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज युवाओं को अपनी प्रतिभा और कौशल का उपयोग करते हुए स्थानीय संसाधनों और भारतीय उत्पादों को वैश्विक स्तर तक पहुंचाने का प्रयास करना चाहिए।
युवाओं से रोजगार सृजक बनने का आह्वान
श्री पाणिग्रही ने कहा कि स्वदेशी अर्थव्यवस्था को मजबूत करना केवल स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने तक सीमित नहीं है। इससे देश में रोजगार, नवाचार और उद्यमिता के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में भारतीय युवाओं द्वारा स्थापित की गई अनेक यूनिकॉर्न कंपनियां उनकी प्रतिभा, नवाचार और उद्यमशीलता की क्षमता को दर्शाती हैं।
उन्होंने युवाओं से केवल नौकरी तलाशने वाला बनने के बजाय रोजगार सृजित करने वाला ‘जॉब गिवर’ बनने की दिशा में आगे बढ़ने का आह्वान किया। उन्होंने बताया कि सरकार की ओर से एमएसएमई, स्टार्टअप और उद्यमिता को प्रोत्साहित करने वाली विभिन्न पहलों के माध्यम से युवाओं को अपने व्यवसाय और नवाचार को आगे बढ़ाने के अवसर दिए जा रहे हैं।
युवा शक्ति और उद्यमशीलता से आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बढ़ने पर जोर
मुख्य अतिथि ने कहा कि सरकारी प्रयासों के साथ युवा शक्ति की रचनात्मक सोच और उद्यमशीलता जुड़कर ‘स्वदेशी से आत्मनिर्भर और आत्मनिर्भर से विकसित भारत’ के लक्ष्य को गति दे सकती है।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. नरेंद्र सिंह ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस दौरान विभिन्न संकायों के संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, शिक्षक, गैर-शिक्षण कर्मचारी, शोधार्थी और विद्यार्थी मौजूद रहे।

