उत्तर प्रदेशराज्य

BBAU के वैज्ञानिकों का बड़ा कमाल! जीवनरक्षक दवाओं के मूल रसायन बनाने की धातु-मुक्त हरित तकनीक को मिला भारतीय पेटेंट

लखनऊ: बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू) के रसायन विज्ञान विभाग ने दवा निर्माण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल की है। विभाग के वैज्ञानिकों ने बिना किसी धातु उत्प्रेरक के जीवनरक्षक दवाओं में उपयोग होने वाले प्राथमिक अमाइन तैयार करने की नई, सरल और पर्यावरण-अनुकूल तकनीक विकसित की है। इस नवाचार को भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय ने भारतीय पेटेंट संख्या 595951 के तहत स्वीकृति प्रदान की है। पेटेंट का शीर्षक है- “एरिल बोरोनिक अम्ल को बिना धातु उत्प्रेरक के सीधे प्राथमिक अमाइन में परिवर्तित करने की विधि”।

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने इस उपलब्धि पर शोध दल को बधाई देते हुए इसे विश्वविद्यालय और वैज्ञानिक समुदाय के लिए गौरवपूर्ण उपलब्धि बताया।

डॉ. जवाहर लाल जाट के नेतृत्व में मिला पेटेंट

इस शोध का नेतृत्व बीबीएयू के रसायन विज्ञान विभाग के डॉ. जवाहर लाल जाट ने किया। उन्होंने शोध की संकल्पना, अनुसंधान की रूपरेखा, नवीन संश्लेषण विधि के विकास और वैज्ञानिक मार्गदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वहीं, शोधार्थी डॉ. पुनीत कुमार ने प्रयोगात्मक अनुसंधान, प्रक्रिया के विकास, अनुकूलन और सत्यापन में प्रमुख योगदान दिया। दोनों के संयुक्त प्रयास से विकसित इस धातु-मुक्त तकनीक को भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय से भारतीय पेटेंट प्राप्त हुआ।

दवा उद्योग के लिए क्यों अहम है यह तकनीक?

वर्तमान समय में नई दवाओं के विकास में नाइट्रोजन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। उपलब्ध वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, पिछले लगभग दस वर्षों में अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (US FDA) द्वारा स्वीकृत करीब 82 प्रतिशत नई दवाओं में कम-से-कम एक नाइट्रोजन परमाणु मौजूद है। इसी कारण जैव-सक्रिय अणुओं में नाइट्रोजन का समावेश आधुनिक कार्बनिक रसायन विज्ञान का प्रमुख अनुसंधान क्षेत्र बन चुका है।

नाइट्रोजन युक्त अणुओं का उपयोग कैंसर, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, तंत्रिका तंत्र संबंधी बीमारियों और एंटीबायोटिक दवाओं सहित अनेक जीवनरक्षक औषधियों के निर्माण में किया जाता है।

क्या है इस नई तकनीक की खासियत?

बीबीएयू के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित तकनीक में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध एरिल बोरोनिक अम्ल को सीधे प्राथमिक अमाइन में परिवर्तित किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में किसी भी प्रकार के धातु उत्प्रेरक की आवश्यकता नहीं होती, जिससे यह तकनीक अधिक सुरक्षित, सरल और पर्यावरण-अनुकूल बन जाती है।

यह विधि एक ही चरण में मृदु परिस्थितियों में पूरी हो जाती है, जिससे उत्पादन प्रक्रिया आसान और व्यावहारिक बनती है। साथ ही इससे अपेक्षाकृत अधिक शुद्ध उत्पाद प्राप्त होता है और धातु अवशेषों की समस्या भी समाप्त हो जाती है। यही कारण है कि यह तकनीक ग्रीन केमिस्ट्री के सिद्धांतों के अनुरूप मानी जा रही है।

पुरानी तकनीकों की कमियों का मिला समाधान

अब तक प्राथमिक अमाइन के निर्माण में पैलेडियम, निकेल, कॉपर और आयरन जैसे धातु उत्प्रेरकों का उपयोग किया जाता रहा है। इन प्रक्रियाओं में महंगे उत्प्रेरकों की आवश्यकता, बहु-चरणीय जटिल प्रक्रिया, धातु अवशेषों से उत्पाद का दूषित होना, अतिरिक्त शुद्धिकरण की जरूरत और उत्पादन लागत में वृद्धि जैसी कई चुनौतियां सामने आती थीं।

नई तकनीक इन समस्याओं को काफी हद तक समाप्त करती है और दवा उद्योग के लिए अधिक किफायती एवं स्वच्छ विकल्प उपलब्ध कराती है।

दवा उद्योग और पर्यावरण दोनों को होगा फायदा

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तकनीक को औद्योगिक स्तर पर अपनाया जाता है तो दवा निर्माण की लागत कम हो सकती है। धातु उत्प्रेरकों पर निर्भरता घटने से उत्पादन प्रक्रिया अधिक सुरक्षित होगी और रासायनिक अपशिष्ट तथा औद्योगिक प्रदूषण में भी कमी आएगी।

इसके अलावा यह तकनीक ग्रीन केमिस्ट्री को बढ़ावा देने के साथ-साथ भारत के फार्मास्यूटिकल, कृषि रसायन और विशेष रसायन उद्योगों को वैश्विक स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने में मददगार साबित हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार यह नवाचार विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और उद्योगों के बीच तकनीकी सहयोग, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और नई स्टार्टअप कंपनियों के लिए भी नए अवसर पैदा करेगा। साथ ही यह “आत्मनिर्भर भारत” और “मेक इन इंडिया” जैसे राष्ट्रीय अभियानों को वैज्ञानिक आधार प्रदान करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

 

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