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शोध की संख्या नहीं, गुणवत्ता, नैतिकता और सामाजिक उपयोगिता से बनेगी पहचान : प्रो. के.पी. सिंह, कुलपति,रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय

 

बरेली, 19 अगस्त। महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय के शोध निदेशालय द्वारा अटल सभागार में “नेक्स्ट जेन स्कॉलर ओरिएंटेशन कॉन्क्लेव” का आयोजन किया गया। विश्वविद्यालय की कुलाधिपति एवं उत्तर प्रदेश की राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल की प्रेरणा तथा कुलपति प्रो. के.पी. सिंह के मुख्य संरक्षण में आयोजित कॉन्क्लेव में देश-विदेश के विशेषज्ञों ने नवप्रवेशित शोधार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शोध, रिसर्च इंटीग्रिटी, वैज्ञानिक प्रकाशन, पेटेंट, डिजिटल रिसर्च संसाधन, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और करियर के अवसरों पर मार्गदर्शन दिया।

कार्यक्रम के प्रारंभ में शोध निदेशालय के निदेशक प्रो. आलोक श्रीवास्तव ने निदेशालय की स्थापना, उद्देश्य, कार्यप्रणाली, शोधार्थियों के लिए उपलब्ध सुविधाओं एवं विभिन्न गतिविधियों की जानकारी देते हुए पूरे कॉन्क्लेव की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य शोधार्थियों को पीएचडी की शुरुआत से ही गुणवत्तापूर्ण, मौलिक और वैश्विक स्तर के अनुसंधान की दिशा देना है।

शोध समाज और राष्ट्र की समस्याओं का समाधान बने : प्रो. के.पी. सिंह

कुलपति प्रो. के.पी. सिंह ने कहा कि विश्वविद्यालय की पहचान शोधार्थियों की संख्या से नहीं, बल्कि शोध की गुणवत्ता, विश्वसनीयता, मौलिकता और सामाजिक उपयोगिता से बनती है। एक सफल वैज्ञानिक या इंजीनियर बनने के साथ शोधार्थी में संवेदनशील सामाजिक दृष्टिकोण भी आवश्यक है और शोध का उद्देश्य समाज एवं राष्ट्र की समस्याओं का समाधान होना चाहिए।

सफलता का रास्ता हमेशा सीधा नहीं होता : प्रो. ओ.पी. धनकर

Stockbridge School of Agriculture, University of Massachusetts, USA के प्रो. ओ.पी. धनकर ने कहा कि सफल शोध की शुरुआत सही Research Topic और Mentor के चयन से होती है। शोधार्थियों को Knowledge Gap की पहचान कर स्पष्ट hypothesis, objectives और वैज्ञानिक experimental design के साथ आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने critical thinking, accuracy, reproducibility और scientific rigor को गुणवत्तापूर्ण शोध की बुनियाद बताया।

उन्होंने कहा, “Road to Success is not always straight” अर्थात असफल प्रयोग भी शोध यात्रा का हिस्सा हैं और उनसे सीखकर आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने टीमवर्क और अंतरराष्ट्रीय शोध सहयोग को आधुनिक विज्ञान की आवश्यकता बताते हुए SPARC, VAJRA, VAIBHAV और GIAN सहित विभिन्न अंतरराष्ट्रीय शोध एवं फेलोशिप अवसरों की जानकारी दी। साथ ही conferences, networking और international collaborations के माध्यम से पोस्ट-डॉक अवसर तलाशने की सलाह दी।

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उच्च प्रभाव वाले जर्नल में प्रकाशन के लिए उन्होंने मजबूत एवं विश्वसनीय डेटा, स्पष्ट वैज्ञानिक लेखन, प्रभावी figures, सही journal selection और peer-review प्रक्रिया की समझ को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने संदेश दिया कि “Team efforts and collaboration is the key of success.”

शोध में नैतिकता से कोई समझौता नहीं : प्रो. मनोज प्रसाद

BRIC-NIPGR, नई दिल्ली के निदेशक प्रो. मनोज प्रसाद ने “करियर की सीढ़ी चढ़ना: मेंटर और मेंटी की भूमिका” विषय पर कहा कि पीएचडी की यात्रा सीखने वाले विद्यार्थी से स्वतंत्र शोधकर्ता और अंततः एक मेंटर बनने की प्रक्रिया है। शुरुआती दौर में शोधार्थियों को विस्तृत Literature Review और प्रयोगात्मक तकनीकों पर ध्यान देना चाहिए, जबकि आगे बढ़ते हुए Troubleshooting, स्वतंत्र चिंतन, गुणवत्तापूर्ण प्रकाशन और नेतृत्व क्षमता विकसित करनी चाहिए।

उन्होंने Research Integrity पर जोर देते हुए data fabrication, manipulation, image manipulation और plagiarism से पूरी तरह बचने की सलाह दी। Raw data एवं lab notebook को व्यवस्थित रखने और नकारात्मक परिणामों को छिपाने के बजाय उनसे सीखने को कहा। उन्होंने कहा कि मजबूत CV केवल शोध पत्रों की संख्या से नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण publications, AI/ML एवं Data Science जैसे आधुनिक कौशल और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय exposure से बनता है।

डिजिटल रिसर्च, पेटेंट और प्रकाशन पर विशेषज्ञों ने किया मार्गदर्शन

कॉन्क्लेव के तकनीकी सत्रों में INFLIBNET Centre, Gandhinagar के Scientist-D श्री हितेश कुमार सोलंकी ने डिजिटल एवं अकादमिक शोध संसाधनों, तथा IEEE के Training Manager श्री लखपत सिंह ने गुणवत्तापूर्ण शोध, तकनीकी संसाधनों एवं वैज्ञानिक प्रकाशन से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं पर शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया।

कॉन्क्लेव ने शोधार्थियों को संदेश दिया कि शोध केवल डिग्री और प्रकाशन तक सीमित न रहकर नैतिकता, मौलिकता, नवाचार, सामाजिक सरोकार, आधुनिक तकनीक, टीमवर्क और वैश्विक सहयोग के माध्यम से समाज एवं राष्ट्र के लिए उपयोगी बनना चाहिए।

बरेली से अखिलेश चन्द्र सक्सेना की रिपोर्ट

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