सैनिटरी पैड को लेकर चौंकाने वाली स्टडी में दावा, महिलाओं की सेहत पर संभावित खतरे की चर्चा तेज
नई दिल्ली: भारत में किशोरावस्था में पहुंच चुकी बड़ी संख्या में लड़कियां मासिक धर्म के दौरान सैनिटरी पैड का उपयोग करती हैं। जागरूकता बढ़ने के साथ इसका इस्तेमाल भी लगातार बढ़ा है, लेकिन हाल ही में सामने आई एक स्टडी ने सैनिटरी पैड की सुरक्षा को लेकर नई बहस छेड़ दी है। अध्ययन में दावा किया गया है कि कुछ सैनिटरी उत्पादों में मौजूद रसायन स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकते हैं।
स्टडी में सैनिटरी पैड्स में मिले हानिकारक रसायन

एनजीओ टॉक्सिक्स लिंक द्वारा की गई इस स्टडी में दावा किया गया है कि बाजार में उपलब्ध कई सैनिटरी पैड ब्रांड्स में फथैलेट्स और वॉलेटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स (VOCs) जैसे रसायनों के अंश पाए गए। रिपोर्ट के अनुसार ये तत्व शरीर में हार्मोनल असंतुलन और लंबे समय में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जुड़े हो सकते हैं।
रिप्रोडक्टिव हेल्थ पर प्रभाव को लेकर चिंता
स्टडी से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि इन उत्पादों में कार्सिनोजेन, रिप्रोडक्टिव टॉक्सिन, एंडोक्राइन डिसरप्टर्स और एलर्जेंस जैसे तत्व भी पाए गए हैं। उनका दावा है कि ये रसायन प्रजनन स्वास्थ्य और हार्मोनल सिस्टम पर प्रभाव डाल सकते हैं, जिससे गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
त्वचा और शरीर पर असर को लेकर विशेषज्ञों की राय
शोध से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, वजाइना की त्वचा शरीर के अन्य हिस्सों की तुलना में अधिक संवेदनशील होती है, जिससे रासायनिक तत्वों का प्रभाव अधिक हो सकता है। इसी वजह से संभावित जोखिम को लेकर चिंता जताई जा रही है।

नियामक व्यवस्था को लेकर भी सवाल
रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि यूरोप में ऐसे उत्पादों के लिए सख्त नियम लागू हैं, जबकि भारत में मानक तो मौजूद हैं लेकिन रासायनिक नियंत्रण को लेकर स्पष्ट और सख्त प्रावधान सीमित हैं। हालांकि यह उत्पाद भारतीय मानक ब्यूरो के अंतर्गत आते हैं।
उपयोग के आंकड़े और बाजार का विस्तार
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के अनुसार, 15 से 24 वर्ष की लगभग 64 प्रतिशत लड़कियां सैनिटरी पैड का उपयोग करती हैं। जागरूकता बढ़ने के साथ इसके उपयोग में लगातार वृद्धि देखी गई है। वहीं, बाजार रिपोर्ट के मुताबिक भारत में सैनिटरी उत्पादों का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है और आने वाले वर्षों में इसमें और विस्तार की संभावना जताई गई है।
