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फेफड़ों की इस बीमारी का देर से चलता है पता, सांस फूलना हो सकता है पहला संकेत; KGMU में देश-विदेश के विशेषज्ञों ने किया मंथन

लखनऊ: किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग की ओर से 8 और 9 अगस्त 2026 को पीएच समिट लखनऊ 2026 का आयोजन किया गया। शताब्दी अस्पताल फेज-2 के ऑडिटोरियम में आयोजित इस दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में देश-विदेश के विशेषज्ञों ने पल्मोनरी हाइपरटेंशन के निदान, उपचार और मरीजों के नतीजों को बेहतर बनाने के तरीकों पर चर्चा की। सम्मेलन का उद्देश्य इस बीमारी के क्षेत्र में हुए नए अध्ययनों और उपचार की प्रगति को मरीजों तक पहुंचाना रहा।

पल्मोनरी हाइपरटेंशन ऐसी स्थिति है, जिसमें फेफड़ों की रक्त वाहिकाओं में रक्तचाप सामान्य से अधिक हो जाता है। इसके कारण हृदय को फेफड़ों तक रक्त पहुंचाने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ती है। सांस फूलना, चक्कर आना और सीने में दर्द इसके प्रमुख लक्षणों में शामिल हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक बीमारी की पहचान अक्सर देर से होती है और शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करना इसकी बड़ी वजह है।

सांस फूलना दिखे तो न करें नजरअंदाज

विशेषज्ञों ने बताया कि सांस फूलना पल्मोनरी हाइपरटेंशन का शुरुआती संकेत हो सकता है। इसके अलावा थकान, कमजोरी, सीने में दर्द, चक्कर आना, पेट या पैरों में सूजन, सूखी खांसी या खांसी के साथ खून आना और होंठ या त्वचा का नीला पड़ना जैसे लक्षण भी सामने आ सकते हैं। कुछ मरीजों में चक्कर इतना बढ़ सकता है कि बेहोशी की स्थिति तक पहुंच जाए।

आंकड़ों के मुताबिक, पल्मोनरी आर्टेरियल हाइपरटेंशन से पीड़ित लगभग 70 से 80 प्रतिशत मरीजों में बीमारी का पता तब चलता है, जब वे पहले ही गंभीर चरण में पहुंच चुके होते हैं। बीमारी के लक्षण शुरू होने और इसके निदान के बीच औसतन 1.5 से 2 साल की देरी भी देखी जाती है। सांस फूलना और थकान जैसे शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करना इस देरी की प्रमुख वजहों में शामिल है।

देर से पता चलने पर इलाज हो जाता है चुनौतीपूर्ण

सम्मेलन में विशेषज्ञों ने बताया कि बिना इलाज वाले पल्मोनरी आर्टेरियल हाइपरटेंशन में मरीज के जीवित रहने की औसत अवधि तीन साल से कम हो सकती है। बीमारी के बढ़ जाने और सामान्य चिकित्सा उपचार से स्थिति नियंत्रित न होने पर फेफड़े या हार्ट-लंग ट्रांसप्लांटेशन अंतिम उपचार विकल्पों में शामिल हो सकता है।

प्रो. वेद प्रकाश ने कहा कि बीमारी की जल्द पहचान और समय पर उपचार बेहद जरूरी है। उनके मुताबिक, पीएच समिट 2026 का उद्देश्य इस क्षेत्र में हुए नए अध्ययनों को मरीजों के इलाज तक पहुंचाना है, ताकि चिकित्सक बेहतर उपचार कर सकें।

पल्मोनरी हाइपरटेंशन के पांच प्रमुख समूह

पल्मोनरी हाइपरटेंशन को पांच प्रमुख समूहों में बांटा गया है। पहले समूह में पल्मोनरी आर्टेरियल हाइपरटेंशन, दूसरे में बाईं ओर की हृदय संबंधी बीमारी के कारण होने वाला पल्मोनरी हाइपरटेंशन, तीसरे में फेफड़ों की बीमारी या ऑक्सीजन की कमी से जुड़ी स्थिति, चौथे में क्रोनिक थ्रोम्बोएम्बोलिक पल्मोनरी हाइपरटेंशन और पांचवें समूह में अज्ञात या कई कारणों से होने वाला पल्मोनरी हाइपरटेंशन शामिल है।

विशेषज्ञों के मुताबिक इसके पीछे बाईं ओर की हृदय संबंधी बीमारियां, फेफड़ों की बीमारी, ऑक्सीजन का कम स्तर, फेफड़ों में रक्त के थक्के और पल्मोनरी धमनियों में होने वाले बदलाव जैसे कई कारण हो सकते हैं। जन्मजात हृदय रोग, एचआईवी संक्रमण, पोर्टल हाइपरटेंशन, संयोजी ऊतक संबंधी बीमारियां और कुछ दवाएं भी इसके जोखिम से जुड़ी हो सकती हैं। कुछ मामले वंशानुगत या बिना किसी ज्ञात कारण के भी होते हैं।

किसे ज्यादा खतरा, किन बातों का रखें ध्यान

पल्मोनरी हाइपरटेंशन किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन इसका पता अक्सर 30 से 60 वर्ष की उम्र के बीच चलता है। पारिवारिक इतिहास, कुछ आनुवंशिक स्थितियां, रक्त के थक्के बनने का पारिवारिक इतिहास, धूम्रपान और गैर-कानूनी नशीली दवाओं का इस्तेमाल जोखिम बढ़ा सकता है। लंबे समय तक एस्बेस्टस जैसे हानिकारक पदार्थों के संपर्क में रहना और कुछ दवाओं का इस्तेमाल भी जोखिम से जुड़ा है।

विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं में पल्मोनरी हाइपरटेंशन की संभावना अधिक हो सकती है, खासकर हार्ट फेलियर या इडियोपैथिक मामलों में। हालांकि इसके पीछे हार्मोन या ऑटोइम्यून बीमारियों की भूमिका हो सकती है।

बीमारी की पुष्टि के लिए कौन-कौन सी जांच

पल्मोनरी हाइपरटेंशन का पता लगाना चुनौतीपूर्ण होता है, क्योंकि इसके लक्षण दिल और फेफड़ों की कई अन्य बीमारियों से मिलते-जुलते हैं। मरीज की मेडिकल हिस्ट्री और शारीरिक जांच के बाद ब्लड टेस्ट, इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम और चेस्ट एक्स-रे जैसे शुरुआती परीक्षण किए जाते हैं।

इसके बाद ट्रांसथोरेसिक इकोकार्डियोग्राफी मुख्य स्क्रीनिंग जांच के तौर पर इस्तेमाल की जाती है। जरूरत के मुताबिक लंग फंक्शन टेस्ट, स्लीप स्टडी और एक्सरसाइज टेस्ट भी किए जा सकते हैं। सीटी स्कैन, कार्डियोवैस्कुलर मैग्नेटिक रेजोनेंस और वेंटिलेशन/परफ्यूजन स्कैन जैसी उन्नत इमेजिंग तकनीकों का भी इस्तेमाल होता है। बीमारी की पुष्टि के लिए राइट-हार्ट कैथीटेराइजेशन किया जाता है, जबकि कुछ मामलों में जेनेटिक टेस्टिंग और लंग बायोप्सी की जरूरत पड़ सकती है।

इलाज में दवाओं से लेकर ट्रांसप्लांट तक विकल्प

पल्मोनरी हाइपरटेंशन को पूरी तरह ठीक करना हमेशा संभव नहीं होता, लेकिन उपचार के जरिए लक्षणों को कम करने और बीमारी को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। इलाज में खान-पान और जीवनशैली में बदलाव के साथ ऑक्सीजन थेरेपी शामिल हो सकती है।

दवाओं के स्तर पर एंडोथेलिन रिसेप्टर एंटागोनिस्ट, फॉस्फोडिएस्टरेज़ टाइप-5 इनहिबिटर, प्रोस्टासाइक्लिन एनालॉग और रिसेप्टर एगोनिस्ट, सॉल्युबल गुआनिलेट साइक्लेज स्टिमुलेटर, कैल्शियम चैनल ब्लॉकर, डाययुरेटिक्स और एंटीकोआगुलंट्स जैसे विकल्प इस्तेमाल किए जाते हैं। बीमारी और मरीज की स्थिति के अनुसार सर्जिकल उपचार में पल्मोनरी एंडार्टरेक्टॉमी, बलून एंजियोप्लास्टी, बलून एट्रियल सेप्टोस्टॉमी और फेफड़े का प्रत्यारोपण शामिल हो सकता है।

पीएच समिट में नई तकनीक और आधुनिक उपचार पर चर्चा

पीएच समिट लखनऊ 2026 का विषय निदान, उपचार और मरीजों के नतीजों को बेहतर बनाने पर केंद्रित रहा। वैज्ञानिक सत्रों में पल्मोनरी हाइपरटेंशन की परिभाषा, पल्मोनरी वैस्कुलर फिजियोलॉजी, राइट वेंट्रिकुलर फंक्शन का इकोकार्डियोग्राफिक आकलन, राइट-हार्ट कैथीटेराइजेशन, जोखिम का आकलन और ग्रुप-1 पल्मोनरी आर्टेरियल हाइपरटेंशन की आधुनिक दवा चिकित्सा पर चर्चा की गई।

सम्मेलन में लेफ्ट-हार्ट बीमारी से जुड़े पल्मोनरी हाइपरटेंशन, इंटरस्टिशियल लंग डिजीज, संयोजी ऊतक संबंधी बीमारियों से जुड़े पल्मोनरी आर्टेरियल हाइपरटेंशन और बच्चों में होने वाले पल्मोनरी हाइपरटेंशन पर भी चर्चा हुई। क्रोनिक थ्रोम्बोएम्बोलिक पल्मोनरी हाइपरटेंशन के निदान और उपचार के साथ सर्जिकल हस्तक्षेप, बलून पल्मोनरी एंजियोप्लास्टी और कैथेटर आधारित पल्मोनरी वैस्कुलर इंटरवेंशन पर विशेष जोर दिया गया।

देश-विदेश से विशेषज्ञ पहुंचे लखनऊ

समिट में अमेरिका के डॉ. संदीप सहाय और आयरलैंड के डॉ. सैयद रेहान क्वादेरी समेत देश के कई विशेषज्ञ और फैकल्टी सदस्य शामिल हुए। इनमें डॉ. दिगंबर बेहरा, डॉ. ध्रुव चौधरी, डॉ. शुभाकर कंडी, डॉ. जूलियस पुन्नेन, डॉ. प्रकाश एस., डॉ. प्रशांत बोभाटे, डॉ. मांसी गुप्ता, डॉ. सत्यवीर यादव, डॉ. अदिति सिंघवी, डॉ. विकास अग्रवाल, डॉ. गौरव चौधरी, डॉ. बाशा जलाल खान, डॉ. जफर नियाज, डॉ. अपार जिंदल, डॉ. राहुल चंदोला और डॉ. अभिषेक टंडन सहित कई विशेषज्ञ शामिल रहे।

विशेषज्ञों ने पल्मोनरी हाइपरटेंशन की पहचान, जोखिम का आकलन, आधुनिक उपचार और गंभीर मरीजों की देखभाल से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार रखे। चर्चा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, लंग ट्रांसप्लांटेशन, ईसीएमओ, आधुनिक इमेजिंग और गंभीर पल्मोनरी हाइपरटेंशन में राइट वेंट्रिकुलर फेलियर के प्रबंधन जैसे विषय भी शामिल रहे।

पद्म श्री प्रोफेसर डॉ. रवि कांत ने किया उद्घाटन

पीएच समिट लखनऊ 2026 का उद्घाटन समारोह 8 अगस्त 2026 को KGMU के शताब्दी अस्पताल फेज-2 की आठवीं मंजिल स्थित ऑडिटोरियम में हुआ। एम्स ऋषिकेश के पूर्व निदेशक और KGMU के पूर्व कुलपति पद्म श्री प्रोफेसर डॉ. रवि कांत मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए।

डॉ. बाशा जे. खान वैज्ञानिक अध्यक्ष के रूप में मौजूद रहे, जबकि डॉ. सुधाकर कंडी विशेष अतिथि के तौर पर शामिल हुए। आयोजन समिति के अध्यक्ष पद्म श्री प्रोफेसर डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने प्रतिनिधियों और गणमान्य अतिथियों का स्वागत किया। आयोजन सचिव प्रोफेसर डॉ. वेद प्रकाश ने उद्घाटन समारोह का संचालन किया।

समारोह में पल्मोनरी हाइपरटेंशन की देखभाल बेहतर बनाने, विभिन्न चिकित्सा विशेषज्ञताओं के बीच सहयोग मजबूत करने और चिकित्सा शिक्षा, शोध तथा मरीजों की देखभाल में उत्कृष्टता को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया।

 

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