पैलेट गन क्या है? कब होता है इसका इस्तेमाल, कितनी खतरनाक होती है और भारत में क्या हैं नियम?
नई दिल्ली: हालिया छात्र प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन के कथित इस्तेमाल को लेकर सियासी विवाद तेज हो गया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान एक छात्र पैलेट गन के छर्रों से घायल हुआ, जबकि दिल्ली पुलिस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए स्पष्ट कहा है कि उसके पास पैलेट गन उपलब्ध नहीं है और संबंधित प्रदर्शन में ऐसे किसी हथियार का इस्तेमाल नहीं किया गया। इस बीच यह जानना जरूरी है कि पैलेट गन क्या होती है, इसका उपयोग किन परिस्थितियों में किया जाता है और भारत में इसके इस्तेमाल को लेकर क्या नियम लागू हैं।
क्या होती है पैलेट गन?

पैलेट गन को कम-घातक हथियारों की श्रेणी में रखा जाता है। इसके फायर होते ही बड़ी संख्या में छोटे-छोटे धातु के छर्रे तेज गति से बाहर निकलते हैं, जो कुछ दूरी तय करने के बाद अलग-अलग दिशाओं में फैल जाते हैं। इसी वजह से इनके प्रभाव की दिशा पर पूरी तरह नियंत्रण रखना कठिन माना जाता है और गंभीर चोट लगने का खतरा बना रहता है।
मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, एक शॉटगन कारतूस में सैकड़ों छोटे धातु के पैलेट हो सकते हैं, जो आमतौर पर सीसे या अन्य मिश्रधातुओं से बने होते हैं।
भारत में कब शुरू हुआ इस्तेमाल?
भारत में दंगा नियंत्रण के लिए पैलेट गन का इस्तेमाल 1990 के दशक में शुरू हुआ। वर्ष 1992 में रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) के गठन के बाद शुरुआती दौर में इन्हें इजरायल और बेल्जियम से खरीदा गया। बाद में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन की सहायता से इनका स्वदेशी निर्माण भी शुरू किया गया।
समय के साथ एकल बैरल प्रणाली की जगह मल्टी-बैरल लॉन्चर विकसित किए गए, जिनसे लगातार कई शेल दागे जा सकते हैं।
एक बार में कितने छर्रे निकलते हैं?
मल्टी-बैरल लॉन्चर में छह से आठ शेल लगाए जा सकते हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, एक शेल से करीब 30 पैलेट निकलते हैं। इस हिसाब से यदि छह शेल दागे जाएं तो कुछ ही सेकंड में 180 से अधिक छर्रे छोड़े जा सकते हैं। इनका उपयोग मुख्य रूप से विशेष रूप से प्रशिक्षित इकाइयों, जैसे रैपिड एक्शन फोर्स, द्वारा किया जाता है।
क्या सीधे पैलेट गन का इस्तेमाल किया जा सकता है?
सरकारी मानक संचालन प्रक्रिया के अनुसार पैलेट गन का उपयोग अंतिम विकल्प के रूप में किया जाना चाहिए। इससे पहले स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अन्य कम-घातक उपाय अपनाने की सलाह दी जाती है।
इन विकल्पों में शामिल हैं:
- आंसू गैस के गोले
- पीएवीए (मिर्च) शेल और ग्रेनेड
- स्टन-एलएसी शेल और ग्रेनेड
- अन्य भीड़ नियंत्रण उपकरण
सरकार का कहना है कि पैलेट गन का इस्तेमाल केवल अत्यंत गंभीर कानून-व्यवस्था की स्थिति में और न्यूनतम आवश्यक बल के सिद्धांत के तहत ही किया जाना चाहिए।

क्या सुरक्षाबलों को मिलता है विशेष प्रशिक्षण?
सरकार के अनुसार, कम-घातक हथियारों के इस्तेमाल के लिए सुरक्षाकर्मियों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। इसमें दंगा नियंत्रण की रणनीति, हथियारों के सुरक्षित उपयोग, बल प्रयोग के नियम और व्यावहारिक अभ्यास शामिल होते हैं। इसका उद्देश्य कानून-व्यवस्था बनाए रखते हुए नागरिकों और सुरक्षाबलों दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
पैलेट गन को लेकर विवाद क्यों होता है?
आंखों और शरीर के संवेदनशील हिस्सों में गंभीर चोट लगने की घटनाओं के बाद पैलेट गन के इस्तेमाल पर लंबे समय से बहस होती रही है। इन्हीं चिंताओं के मद्देनजर केंद्र सरकार ने वर्ष 2016 में एक विशेषज्ञ समिति गठित की थी, जिसने वैकल्पिक कम-घातक हथियारों के उपयोग की सिफारिश की थी। इसके बाद पीएवीए शेल जैसे विकल्पों के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया गया।
भीड़ नियंत्रण को लेकर क्या कहता है कानून?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 148 के तहत कार्यकारी मजिस्ट्रेट, थाना प्रभारी या उनकी अनुपस्थिति में कम से कम सब-इंस्पेक्टर स्तर का अधिकारी गैरकानूनी भीड़ को हटने का आदेश दे सकता है।
यदि आदेश के बावजूद भीड़ नहीं हटती और सार्वजनिक शांति या सुरक्षा को खतरा बना रहता है, तो कानून के अनुसार आवश्यक और न्यूनतम बल का प्रयोग किया जा सकता है। आवश्यकता पड़ने पर संबंधित लोगों की गिरफ्तारी भी की जा सकती है।
धारा 149 के तहत यदि स्थिति पुलिस के नियंत्रण से बाहर हो जाए और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए जरूरी हो, तो जिला मजिस्ट्रेट या अधिकृत कार्यकारी मजिस्ट्रेट सशस्त्र बलों की सहायता ले सकता है। हालांकि कानून यह भी स्पष्ट करता है कि हर स्थिति में केवल उतना ही बल प्रयोग किया जाए, जितना आवश्यक हो और लोगों व संपत्ति को न्यूनतम नुकसान पहुंचे।
दिल्ली पुलिस ने क्या कहा?
दिल्ली पुलिस ने छात्र प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन के इस्तेमाल के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। पुलिस का कहना है कि उसके पास पैलेट गन उपलब्ध नहीं है और संबंधित प्रदर्शन के दौरान ऐसे किसी हथियार का इस्तेमाल नहीं किया गया। वहीं, इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक बयानबाजी और जांच की मांग लगातार जारी है।
