महलों के नीचे क्यों बनाई जाती थीं कई किलोमीटर लंबी गुप्त सुरंगें? सिर्फ भागने के लिए नहीं, इन 5 वजहों ने बना दिया था इन्हें राजाओं का सबसे बड़ा ‘सीक्रेट हथियार’

नई दिल्ली: भारत के प्राचीन किले और महल केवल अपनी भव्य वास्तुकला के लिए ही प्रसिद्ध नहीं हैं, बल्कि उनके भीतर छिपे रहस्यमयी निर्माण भी आज तक लोगों को हैरान करते हैं। इन्हीं में सबसे ज्यादा चर्चा गुप्त सुरंगों की होती है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और देश के कई ऐतिहासिक किलों में आज भी ऐसी सुरंगों के उल्लेख मिलते हैं, जिनके बारे में माना जाता है कि वे कई किलोमीटर दूर तक जाती थीं। आम धारणा है कि इनका इस्तेमाल केवल युद्ध के समय जान बचाने के लिए किया जाता था, लेकिन इतिहासकारों के अनुसार इन सुरंगों की भूमिका इससे कहीं अधिक व्यापक थी।

क्या वास्तव में कई किलोमीटर लंबी होती थीं सुरंगें?
ऐतिहासिक अभिलेखों और कई किलों से जुड़ी स्थानीय मान्यताओं के अनुसार अनेक दुर्गों में ऐसी गुप्त सुरंगें बनाई गई थीं, जो किले को जंगल, पहाड़ी, नदी या किसी सुरक्षित स्थान से जोड़ती थीं। हालांकि सभी सुरंगों की वास्तविक लंबाई और उपयोग को लेकर अलग-अलग ऐतिहासिक मत हैं, लेकिन यह तय माना जाता है कि इनका निर्माण सुरक्षा और रणनीति को ध्यान में रखकर किया जाता था।
युद्ध के समय सुरक्षित निकासी का रास्ता
जब किसी किले को दुश्मन सेना चारों ओर से घेर लेती थी और लंबे समय तक घेराबंदी के कारण भोजन तथा अन्य संसाधनों की कमी होने लगती थी, तब यही गुप्त सुरंगें राजा, राजपरिवार और महत्वपूर्ण अधिकारियों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने का माध्यम बनती थीं। इन रास्तों का दूसरा सिरा अक्सर ऐसी जगह बनाया जाता था, जहां दुश्मन की नजर आसानी से न पहुंच सके।
राजकीय खजाने की सुरक्षा के लिए भी थीं अहम
कई किलों में सुरंगें ऐसे तहखानों तक जाती थीं, जहां सोना, चांदी, बहुमूल्य आभूषण और महत्वपूर्ण राजकीय दस्तावेज सुरक्षित रखे जाते थे। सीमित लोगों को ही इन रास्तों की जानकारी होती थी, जिससे संकट के समय खजाने को सुरक्षित रखना आसान हो जाता था।
गुप्त बैठकों के लिए चुनी जाती थीं ये जगहें
राज्य की सुरक्षा, युद्ध नीति या कूटनीतिक फैसलों पर चर्चा करने के लिए राजा कई बार महल के सामान्य हिस्सों की बजाय गुप्त कक्षों का उपयोग करते थे। इन कमरों तक पहुंचने के लिए विशेष सुरंगें बनाई जाती थीं, ताकि संवेदनशील जानकारी बाहर न जा सके।

गुप्तचरों की आवाजाही रहती थी आसान
प्राचीन भारतीय राज्यों में गुप्तचर व्यवस्था शासन का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती थी। शत्रु राज्यों से सूचनाएं लाने और संदेश पहुंचाने वाले गुप्तचर बिना किसी की नजर में आए महल तक पहुंच सकें, इसके लिए भी कई स्थानों पर गुप्त मार्ग बनाए जाते थे। इन रास्तों की जानकारी बेहद सीमित लोगों तक ही रखी जाती थी।
युद्ध में दुश्मन को चौंकाने की रणनीति
इतिहास में कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं, जहां किलों की गुप्त सुरंगों का उपयोग सैन्य रणनीति के तहत किया गया। सैनिक इन रास्तों से निकलकर दुश्मन पर दूसरी दिशा से अचानक हमला कर देते थे। इस तरह की रणनीति से विरोधी सेना भ्रमित हो जाती थी और युद्ध की दिशा बदल सकती थी।
क्या आज भी मौजूद हैं ऐसी सुरंगें?
देश के कई ऐतिहासिक किलों और महलों में आज भी गुप्त सुरंगों के अवशेष देखने को मिलते हैं। हालांकि सुरक्षा कारणों, समय के प्रभाव और संरचनात्मक क्षति की वजह से अधिकांश सुरंगों को बंद कर दिया गया है या आम लोगों के लिए खोलना सुरक्षित नहीं माना जाता। पुरातत्व विशेषज्ञ इन संरचनाओं को उस दौर की उन्नत सैन्य इंजीनियरिंग और सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण उदाहरण मानते हैं।
