बीबीएयू में भारतीय भाषा पुस्तक योजना पर कार्यशाला का समापन, शिक्षा और शोध में भारतीय भाषाओं को सशक्त बनाने पर जोर

लखनऊ: बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू) में भारतीय भाषाओं को शिक्षा, शोध और ज्ञान-सृजन की प्रभावी भाषा बनाने पर जोर दिया गया। विश्वविद्यालय और भारतीय भाषा समिति, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के संयुक्त तत्वावधान में ‘भारतीय भाषा पुस्तक योजना के राज्य स्तरीय क्रियान्वयन हेतु’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला का 8 सितंबर को समापन हुआ। कार्यक्रम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल के दिशानिर्देशन एवं संरक्षण में आयोजित किया गया।

समापन सत्र में काशी विद्यापीठ, बनारस के प्रो. नरेंद्र नारायण, दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय, गोरखपुर की प्रो. सुषमा पाण्डेय, भारतीय भाषा समिति के शैक्षणिक समन्वयक डॉ. चंदन श्रीवास्तव, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, बनारस के प्रो. शैलेश मिश्रा, जवाहर लाल नेहरू स्मारक पीजी कॉलेज, महाराजगंज के प्रधानाचार्य डॉ. अजय मिश्रा और कार्यक्रम संयोजक डॉ. बलजीत कुमार श्रीवास्तव मौजूद रहे। कार्यक्रम की शुरुआत प्रो. उदयन मिश्र के स्वागत संबोधन से हुई। उन्होंने प्रतिभागियों को कार्यशाला के उद्देश्य और रूपरेखा की जानकारी दी।
हिंदी को ज्ञान और शोध की सशक्त भाषा बनाने पर जोर
काशी विद्यापीठ, बनारस के प्रो. नरेंद्र नारायण ने अपने संबोधन में भारतेन्दु हरिश्चंद्र की प्रसिद्ध पंक्तियों ‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल॥’ का उल्लेख करते हुए भाषा के महत्व को रेखांकित किया।
उन्होंने कहा कि किसी भी राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान, ज्ञान-विकास और सामाजिक चेतना में उसकी भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उन्होंने विभिन्न देशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार तथा अध्ययन-अध्यापन के लिए किए जा रहे प्रयासों का उल्लेख करते हुए इसकी वैश्विक स्वीकार्यता पर प्रकाश डाला।
प्रो. नारायण ने मैथिलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, भारतेन्दु हरिश्चंद्र और मुंशी प्रेमचंद जैसे साहित्यकारों के योगदान का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इन रचनाकारों ने हिंदी साहित्य को समृद्ध करने के साथ समाज में जागरूकता, राष्ट्रीय चेतना और मानवीय मूल्यों को मजबूत किया। हिंदी को केवल साहित्य और संवाद की भाषा तक सीमित न रखते हुए उन्होंने इसे शिक्षा, शोध और ज्ञान-सृजन की सशक्त भाषा बनाने की आवश्यकता बताई।
भारतीय ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत
भारतीय भाषा समिति के शैक्षणिक समन्वयक डॉ. चंदन श्रीवास्तव ने कहा कि कार्यशाला का उद्देश्य भारतीय इतिहास, संस्कृति और ज्ञान परंपरा की ओर दोबारा लौटना तथा उस पर गंभीरता से कार्य करना है।
उन्होंने कहा कि भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा में शिक्षा, विज्ञान, चिकित्सा, गणित, दर्शन, कला और जीवन मूल्यों से संबंधित व्यापक ज्ञान मौजूद है। जरूरत इस बात की है कि इस ज्ञान को भारतीय भाषाओं के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए और आधुनिक संदर्भों के अनुरूप विकसित किया जाए।
उन्होंने भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण पुस्तकों के निर्माण और व्यापक प्रसार को भाषा के संरक्षण एवं संवर्धन के साथ विद्यार्थियों को उनकी जड़ों, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बताया।
शिक्षा और ज्ञान-विमर्श में भारतीय भाषाओं को मिले उचित स्थान
दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय, गोरखपुर की प्रो. सुषमा पाण्डेय ने कहा कि कोई भी देश अपनी निज भाषा के माध्यम से वास्तविक और व्यापक प्रगति कर सकता है। भाषा आम जनमानस से जुड़ने और ज्ञान को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम है।
उन्होंने भारत की प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा तथा भारतीय वैदिक शिक्षा, योग और ज्ञान परंपरा के वैश्विक प्रभाव का उल्लेख किया। प्रो. सुषमा ने वर्ष 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति से लेकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 तक भाषा और शिक्षा से संबंधित प्रावधानों तथा प्रयासों पर भी चर्चा की।
उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं को शिक्षा और ज्ञान-विमर्श में उचित स्थान देना समय की आवश्यकता है। साथ ही भारतीय शिक्षा व्यवस्था का भारतीयकरण करने और समृद्ध ज्ञान परंपरा, भाषाओं तथा सांस्कृतिक मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की जिम्मेदारी पर जोर दिया।
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डिजिटल माध्यमों से भारतीय भाषाओं का विस्तार संभव
संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, बनारस के प्रो. शैलेश मिश्रा ने भारतीय भाषाओं के प्रचार-प्रसार में डिजिटल तकनीक की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि ई-बुक्स, डिजिटल पुस्तकालय, ऑनलाइन पाठ्य सामग्री, ऑडियो-वीडियो कंटेंट और विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए भारतीय भाषाओं में उपलब्ध ज्ञान को व्यापक स्तर पर पहुंचाया जा सकता है।
उन्होंने भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण और समकालीन सामग्री के निर्माण, अनुवाद और प्रसार पर जोर दिया। उनके अनुसार तकनीक के प्रभावी इस्तेमाल से विद्यार्थी और युवा अपनी भाषा में ज्ञान प्राप्त करने के साथ उससे सहज रूप से जुड़ सकेंगे।
शोध को समाज और जनसरोकारों से जोड़ने की जरूरत
जवाहर लाल नेहरू स्मारक पीजी कॉलेज, महाराजगंज के प्रधानाचार्य डॉ. अजय मिश्रा ने पूर्ववर्ती वर्षों के शोध और वर्तमान समय में हो रहे शोध कार्यों के स्वरूप में आए बदलाव पर चर्चा की।
उन्होंने कहा कि शोध का प्रमुख उद्देश्य समाज की वास्तविक समस्याओं को समझना, उनके कारणों की पहचान करना और उनके समाधान के लिए व्यावहारिक उपाय प्रस्तुत करना होना चाहिए। उन्होंने शोध को दोबारा समाज और जनसरोकारों से जोड़ने की आवश्यकता बताई।
डॉ. मिश्रा ने हिंदी में शोध कार्यों को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि हिंदी को केवल संचार की भाषा तक सीमित न रखते हुए ज्ञान, अनुसंधान और अकादमिक विमर्श की सशक्त भाषा के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।
भारतीय भाषा पुस्तक योजना के क्रियान्वयन पर हुआ मंथन
कार्यक्रम में ‘भारतीय भाषा पुस्तक योजना : एक परिचय’ विषय पर विशेष सत्र आयोजित किया गया। इसमें भारतीय भाषाओं में उच्च गुणवत्ता वाली पुस्तकों के लेखन, प्रकाशन और प्रसार को गति देने से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हुई।
प्रतिभागियों ने राज्य स्तर पर योजना के क्रियान्वयन से जुड़े प्रारूपों और प्रक्रियाओं पर अपने विचार साझा किए। समूह गतिविधियों के माध्यम से योजना को लागू करने में आने वाली संभावनाओं और चुनौतियों पर चर्चा की गई तथा उपयोगी और व्यावहारिक सुझाव सामने रखे गए।
सत्र का उद्देश्य भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण पुस्तक प्रकाशन की संस्कृति को प्रोत्साहित करना और राज्यों में योजना के प्रभावी एवं समन्वित क्रियान्वयन के लिए सामूहिक प्रयासों को मजबूत करना रहा।
कार्यशाला में विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों से आए शिक्षक और प्रतिभागी, बीबीएयू के शिक्षक तथा गैर-शिक्षण अधिकारी मौजूद रहे।

