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रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राय के दो बड़े फैसले : अब बुके की जगह पुस्तक या पौधे दिए जाएंगे अतिथियों को भेंट

 

बरेली,09 सितम्बर। महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय में पर्यावरण संरक्षण, भारतीय ज्ञान-परंपरा और सामाजिक उत्तरदायित्व को बढ़ावा देने की दिशा में कुलपति प्रो. (डॉ.) अनिल कुमार राय ने दो महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं। विश्वविद्यालय में अब अतिथियों के स्वागत एवं सम्मान में पारंपरिक बुके की जगह पुस्तक या पौधा भेंट किया जाएगा। इसके साथ ही विश्वविद्यालय परिसर को बंद बोतल वाले पानी और अनावश्यक प्लास्टिक के उपयोग से मुक्त करने की दिशा में भी प्रभावी कदम उठाए जाएंगे।

कुलपति प्रो. राय ने कहा कि स्वागत में दिया गया बुके कुछ समय बाद अनुपयोगी हो जाता है, जबकि एक अच्छी पुस्तक ज्ञान का उपहार है और एक पौधा भविष्य की पीढ़ियों के लिए जीवन का उपहार। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय केवल शिक्षा प्रदान करने का केंद्र नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाली संस्था है। इसलिए विश्वविद्यालय की कार्यसंस्कृति में ऐसे छोटे-छोटे बदलाव किए जाने चाहिए, जिनका व्यापक सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव हो।

उन्होंने कहा कि अतिथियों को पुस्तक भेंट करने की परंपरा से पठन-पाठन और ज्ञान-संस्कृति को प्रोत्साहन मिलेगा, जबकि पौधा भेंट करने से पर्यावरण संरक्षण का संदेश जन-जन तक पहुंचेगा।

प्लास्टिक मुक्त परिसर की ओर कदम

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कुलपति ने विश्वविद्यालय परिसर में बंद बोतल वाले पानी के उपयोग को हतोत्साहित करने तथा सिंगल-यूज प्लास्टिक पर प्रभावी नियंत्रण के निर्देश दिए हैं। इसके स्थान पर सुरक्षित एवं टिकाऊ पेयजल व्यवस्था तथा पुन: उपयोग किए जा सकने वाले विकल्पों को बढ़ावा दिया जाएगा। कार्यक्रम के दौरान मंच पर बोतल बंद पानी की जगह काँच या ताँबा के गिलास और लोटा या जग अब स्थान लेंगे ।

प्रो. राय ने कहा कि विश्वविद्यालय परिसर को स्वच्छ, हरित और पर्यावरण-अनुकूल बनाना केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है। इसमें शिक्षकों, कर्मचारियों और विद्यार्थियों की सामूहिक भागीदारी आवश्यक है। उन्होंने विद्यार्थियों का आह्वान किया कि वे प्लास्टिक के कम से कम उपयोग, स्वच्छता और पौधारोपण को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाएं।

कुलपति ने कहा कि विश्वविद्यालय का लक्ष्य केवल ‘प्लास्टिक मुक्त परिसर’ बनना नहीं, बल्कि ऐसा परिसर विकसित करना है जहां पर्यावरणीय चेतना जीवनशैली का हिस्सा बने। पुस्तक और पौधे को सम्मान-संस्कृति का माध्यम बनाना इसी सोच की शुरुआत है।

बरेली से अखिलेश चन्द्र सक्सेना की रिपोर्ट

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