8 साल बाद आया दुर्लभ संयोग! ज्येष्ठ अधिक पूर्णिमा पर बने कई शुभ योग, दान-पुण्य और विष्णु-लक्ष्मी पूजा का विशेष महत्व
नई दिल्ली ज्येष्ठ अधिक पूर्णिमा इस वर्ष धार्मिक, ज्योतिषीय और खगोलीय दृष्टि से बेहद खास मानी गई। करीब आठ वर्षों बाद आए इस दुर्लभ संयोग ने श्रद्धालुओं और धर्माचार्यों का विशेष ध्यान आकर्षित किया। अधिक मास की पूर्णिमा होने के साथ-साथ यह मई महीने की दूसरी पूर्णिमा भी रही, जिसके कारण इसे ब्लू मून की श्रेणी में रखा गया। वहीं पृथ्वी से अधिक दूरी पर होने के कारण चंद्रमा माइक्रोमून के रूप में भी दिखाई दिया, जिससे इस तिथि का महत्व और बढ़ गया।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अधिक मास भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। इस दौरान किए गए जप, तप, व्रत, दान और पूजा-पाठ को विशेष फलदायी बताया गया है। ज्येष्ठ अधिक पूर्णिमा के अवसर पर श्रद्धालुओं ने भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा-अर्चना कर सुख, समृद्धि और सौभाग्य की कामना की।

स्नान, दान और पूजा का रहा विशेष महत्व
पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ अधिक पूर्णिमा तिथि 30 मई की सुबह प्रारंभ होकर 31 मई की दोपहर तक प्रभावी रही। इस दौरान देशभर के मंदिरों, तीर्थ स्थलों और नदी घाटों पर श्रद्धालुओं की भीड़ देखने को मिली। लोगों ने विधि-विधान से पूजा कर परिवार की खुशहाली, आर्थिक उन्नति और मानसिक शांति की प्रार्थना की।
धार्मिक विद्वानों के अनुसार अधिक मास में पड़ने वाली पूर्णिमा आध्यात्मिक साधना और पुण्य कर्मों के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है। मान्यता है कि इस दिन किए गए धार्मिक कार्यों का फल कई गुना बढ़ जाता है।
ब्लू मून और माइक्रोमून ने बढ़ाई विशेषता
खगोलीय दृष्टि से भी यह पूर्णिमा बेहद खास रही। एक ही कैलेंडर महीने में दूसरी बार पूर्णिमा पड़ने की स्थिति को ब्लू मून कहा जाता है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि चंद्रमा नीले रंग का दिखाई देता है, बल्कि यह एक खगोलीय घटना का नाम है।
इसके साथ ही इस बार चंद्रमा पृथ्वी से अपेक्षाकृत अधिक दूरी पर स्थित था, जिसके कारण वह सामान्य पूर्णिमा की तुलना में थोड़ा छोटा दिखाई दिया। इस स्थिति को माइक्रोमून कहा जाता है, जो खगोल विज्ञान में विशेष महत्व रखती है।

जलदान और सेवा कार्यों को माना गया पुण्यदायी
ज्येष्ठ मास में भीषण गर्मी को देखते हुए धर्मशास्त्रों में जलदान, शीतल पेय पदार्थों का वितरण और जरूरतमंदों की सहायता को विशेष पुण्यदायी बताया गया है। इसी परंपरा के तहत कई स्थानों पर लोगों ने राहगीरों के लिए जल सेवा, शरबत वितरण और भोजन प्रसाद की व्यवस्था की।
श्रद्धालुओं ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र, फल और अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान भी किया। धार्मिक मान्यता है कि ऐसे कार्यों से परिवार में सुख-शांति और आर्थिक स्थिरता बनी रहती है।
महासौभाग्य का प्रतीक माना जाता है यह संयोग
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार अधिक मास, पूर्णिमा, ब्लू मून और माइक्रोमून जैसे दुर्लभ संयोग लंबे अंतराल के बाद बनते हैं। इसलिए इन्हें शुभ और सौभाग्यवर्धक माना जाता है। धर्माचार्यों का कहना है कि ऐसे अवसर आध्यात्मिक उन्नति, सकारात्मक ऊर्जा और पुण्य अर्जित करने के लिए विशेष महत्व रखते हैं।
देशभर में श्रद्धालुओं ने इस अवसर को आस्था, सेवा और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ मनाया, जिससे मंदिरों और तीर्थस्थलों पर भक्तिमय वातावरण देखने को मिला।
