होर्मुज संकट का असर! कच्चा तेल 95 डॉलर के करीब, पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर मंडराया महंगाई का खतरा
नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी टकराव तथा होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े हालिया घटनाक्रमों ने अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में हलचल बढ़ा दी है। इसी बीच कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया है, जिससे तेल आयात करने वाले देशों की चिंता भी बढ़ गई है।
बाजार के ताजा आंकड़ों के अनुसार, ब्रेंट क्रूड की कीमतें तेजी के साथ बढ़कर 95 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं। वहीं अमेरिकी बेंचमार्क डब्ल्यूटीआई क्रूड में भी मजबूती देखी गई है। जानकारों का कहना है कि तेल आपूर्ति को लेकर बढ़ती आशंकाओं ने बाजार की धारणा को प्रभावित किया है और इसी वजह से कीमतों में यह उछाल देखने को मिला है।

दुनिया की तेल सप्लाई की लाइफलाइन है होर्मुज जलडमरूमध्य
होर्मुज जलडमरूमध्य को वैश्विक तेल परिवहन का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग माना जाता है। दुनिया भर में समुद्री रास्तों से होने वाले तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी तरह का सैन्य तनाव या आपूर्ति बाधित होने की आशंका सीधे अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर असर डालती है।
हालिया घटनाओं के बाद निवेशकों ने संभावित आपूर्ति जोखिम को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया है। यही वजह है कि तेल बाजार में अनिश्चितता बढ़ने के साथ कीमतों में भी तेजी दर्ज की गई है।
तनाव बढ़ा तो और महंगा हो सकता है कच्चा तेल
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में हालात और बिगड़ते हैं या तेल आपूर्ति प्रभावित होती है तो आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतों में और बढ़ोतरी हो सकती है। हालांकि तेल बाजार की दिशा काफी हद तक क्षेत्रीय राजनीतिक और सैन्य घटनाक्रमों पर निर्भर करेगी।
फिलहाल निवेशक और ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े कारोबारी हर नए घटनाक्रम पर पैनी नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि स्थिति में किसी भी बदलाव का असर वैश्विक कीमतों पर तुरंत पड़ सकता है।

भारत पर क्या पड़ेगा असर?
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देशों में शामिल है और अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहीं तो परिवहन लागत, औद्योगिक उत्पादन और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें केवल कच्चे तेल की दरों पर निर्भर नहीं करतीं। इनमें कर, परिवहन व्यय, डॉलर-रुपया विनिमय दर और तेल विपणन कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति भी अहम भूमिका निभाती है।
फिलहाल ईंधन दरों में कोई बदलाव नहीं
देश के प्रमुख महानगरों दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई में फिलहाल पेट्रोल और डीजल की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं। अब तक ईंधन दरों में किसी नई बढ़ोतरी की आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय बाजार में जारी उतार-चढ़ाव ने उपभोक्ताओं और उद्योग जगत की चिंता बढ़ा दी है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया की स्थिति, वैश्विक मांग-आपूर्ति संतुलन और प्रमुख तेल उत्पादक देशों की नीतियां कच्चे तेल की कीमतों की दिशा तय करेंगी। ऐसे में ऊर्जा बाजार में अस्थिरता का दौर अभी कुछ समय तक जारी रह सकता है।
