मेडिकल छात्रों में खुदकुशी के विचार आम लोगों से ज्यादा, 37 हजार छात्रों की रिपोर्ट में सामने आई चिंताजनक तस्वीर
नई दिल्ली: मेडिकल की पढ़ाई कर रहे छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक शोध रिपोर्ट में चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि आम लोगों की तुलना में मेडिकल छात्रों में खुदकुशी के विचार आने की दर अधिक है। पढ़ाई का दबाव, लंबे समय तक तनाव और मेडिकल प्रशिक्षण से जुड़ी चुनौतियां छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकती हैं।
मेडिकल छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर हुआ अध्ययन

इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च में प्रकाशित शोध रिपोर्ट में राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग की ओर से मेडिकल छात्रों में बढ़ते तनाव को लेकर गठित राष्ट्रीय कार्यबल की रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। वर्ष 2024 में इस कार्यबल ने देशभर के मेडिकल कॉलेजों में पढ़ रहे करीब 37 हजार छात्रों से उनके मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जानकारी जुटाई थी।
इस अध्ययन में एमबीबीएस के साथ स्नातकोत्तर स्तर पर पढ़ाई कर रहे मेडिकल छात्रों को भी शामिल किया गया था। रिपोर्ट में मेडिकल शिक्षा के दौरान छात्रों पर पड़ने वाले मानसिक दबाव और उससे जुड़ी समस्याओं का आकलन किया गया।
27.8 फीसदी एमबीबीएस छात्रों में मानसिक स्वास्थ्य समस्या
रिपोर्ट के मुताबिक 27.8 फीसदी एमबीबीएस छात्र किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे थे। इनमें 16.2 फीसदी छात्रों ने बताया कि उनके मन में खुदकुशी करने के विचार आते हैं।
वहीं, स्नातकोत्तर स्तर की पढ़ाई कर रहे 15.3 फीसदी मेडिकल छात्रों में किसी न किसी तरह की मानसिक स्वास्थ्य समस्या पाई गई। इनमें 31.2 फीसदी छात्रों ने खुदकुशी के विचार आने की बात स्वीकार की।
आम लोगों के मुकाबले ज्यादा चिंताजनक स्थिति
रिपोर्ट में आम लोगों से जुड़े अध्ययन के आंकड़ों का भी उल्लेख किया गया है। इसके मुताबिक आम आबादी में 10.6 फीसदी लोगों ने खुदकुशी के विचार आने की बात कही थी। इसकी तुलना में मेडिकल छात्रों के बीच सामने आए आंकड़े अधिक हैं।

शोध में बताया गया है कि मेडिकल शिक्षा के दौरान छात्रों को लंबे समय तक तनाव, पढ़ाई के दबाव और प्रशिक्षण से जुड़ी मुश्किल परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। इसका असर उनके मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।
राष्ट्रीय कार्यबल ने दिए कई सुझाव
मेडिकल छात्रों में बढ़ते मानसिक तनाव से निपटने के लिए राष्ट्रीय कार्यबल ने कई सुझाव दिए थे। इनमें छात्रों की ड्यूटी को सप्ताह में अधिकतम 74 घंटे तक सीमित करने की सिफारिश शामिल थी।
इसके अलावा शिक्षकों को प्रशिक्षण देने, एमबीबीएस पाठ्यक्रम में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विषयों को शामिल करने और छात्रों को उचित भुगतान देने का सुझाव भी दिया गया था।
उपायों की नियमित समीक्षा की सिफारिश
राष्ट्रीय कार्यबल ने इन उपायों के क्रियान्वयन की हर पखवाड़े समीक्षा करने की भी सिफारिश की थी। रिपोर्ट के मुताबिक इन उपायों को देशभर में लागू किया गया है।
