बीबीएयू के वैज्ञानिकों ने खोजा टीबी बैक्टीरिया का संभावित ‘ड्रग पंप’, दवा प्रतिरोध के खिलाफ नई उम्मीद

लखनऊ: बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू) की शोध टीम ने तपेदिक यानी टीबी पैदा करने वाले जीवाणु माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस में दवा प्रतिरोध से जुड़ा एक महत्वपूर्ण आणविक सुराग हासिल किया है। जैव प्रौद्योगिकी विभाग के डॉ. युसूफ अख्तर और प्रो. दिनेश राज मोदी के नेतृत्व में पीएचडी शोधार्थी दीप्ति धूसिया ने Rv0191 नाम के एक संभावित ड्रग इफ्लक्स ट्रांसपोर्टर का अध्ययन किया है। शोध में सामने आया है कि यह प्रोटीन टीबी की पहली पंक्ति की दवा पायराज़िनामाइड (PZA) को जीवाणु कोशिका से बाहर निकालने में भूमिका निभा सकता है।

यह अध्ययन ‘प्रोटींस: स्ट्रक्चर, फंक्शन, एंड बायोइन्फॉर्मेटिक्स’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं का मानना है कि Rv0191 जैसे ट्रांसपोर्टर की कार्यप्रणाली को समझना भविष्य में दवा प्रतिरोध से निपटने के लिए नई रणनीतियां विकसित करने में मदद कर सकता है।
क्या है यह संभावित ‘ड्रग पंप’
माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस एंटीबायोटिक दवाओं से बचने के लिए कोशिका के भीतर दवा की मात्रा कम कर सकता है। इसके लिए इफ्लक्स ट्रांसपोर्टर आणविक पंप की तरह काम करते हैं और दवाओं को कोशिका से बाहर निकाल सकते हैं। शोध टीम ने इसी प्रक्रिया में Rv0191 की संभावित भूमिका को समझने की कोशिश की है।
Rv0191 मेजर फैसिलिटेटर सुपरफैमिली यानी MFS से संबंधित एक बैक्टीरियल ट्रांसपोर्टर प्रोटीन है। शोधकर्ताओं ने यह जानने पर ध्यान केंद्रित किया कि यह प्रोटीन PZA के साथ किस तरह परस्पर क्रिया करता है और दवा को कोशिका के आर-पार ले जाने की प्रक्रिया कैसे हो सकती है।
500 नैनोसेकंड के सिमुलेशन से समझी प्रोटीन की गतिविधि
शोध के दौरान मॉलिक्यूलर डॉकिंग और लंबे समय तक किए गए मॉलिक्यूलर डायनेमिक्स सिमुलेशन का इस्तेमाल किया गया। टीम ने Rv0191 को किसी स्थिर संरचना के बजाय लगातार आकार बदलने वाले गतिशील प्रोटीन के रूप में मॉडल किया।
शोधकर्ताओं ने इसकी दो कार्यात्मक अवस्थाओं, आउटवर्ड-ओपन और इनवर्ड-ओपन, का अध्ययन किया। इसका उद्देश्य यह समझना था कि Rv0191 PZA को बैक्टीरियल झिल्ली के आर-पार ले जाने में किस तरह भूमिका निभा सकता है।
तीन अलग-अलग प्रतिकृतियों में 500 नैनोसेकंड के सिमुलेशन किए गए। इनमें देखा गया कि PZA ट्रांसपोर्टर के भीतर कुछ विशिष्ट अवशेषों के साथ परस्पर क्रिया करने के बाद केंद्रीय सुरंग से गुजरता है और साइटोप्लाज्मिक हिस्से से पेरिप्लाज्मिक हिस्से की ओर बढ़ता है।
Glu37 के बदलाव से बदलती दिखी प्रोटीन की अवस्था
अध्ययन में ट्रांसपोर्टर के भीतर मौजूद ऋणात्मक आवेश वाले अवशेष Glu37 की प्रोटोनेशन अवस्था में बदलाव को महत्वपूर्ण पाया गया। शोध के अनुसार, इस बदलाव से Rv0191 की आउटवर्ड-ओपन अवस्था से एक मध्यवर्ती यानी ‘ऑक्लूडेड’ अवस्था की ओर जाने की संभावना दिखाई दी।
यह आकार परिवर्तन प्रोटीन के आंतरिक चैनल के जरिए अणुओं को पकड़ने और आगे बढ़ाने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण हो सकता है। सिमुलेशन के दौरान Rv0191 के अलग-अलग हिस्सों में गति का स्तर भी अलग-अलग पाया गया। विशेष रूप से कुछ लूप क्षेत्रों में अधिक लचीलापन दिखाई दिया, जो ट्रांसपोर्ट मार्ग को खोलने और बंद करने में भूमिका निभा सकता है।
सिर्फ मजबूत पकड़ नहीं, दवा को आगे बढ़ाना भी अहम
शोध के निष्कर्षों से संकेत मिलता है कि किसी दवा का ट्रांसपोर्टर से मजबूती से जुड़ना ही प्रभावी इफ्लक्स के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके बजाय यह भी महत्वपूर्ण है कि ट्रांसपोर्टर दवा को कितनी प्रभावी तरह पहचानता है, उसे अपने भीतर समायोजित करता है और फिर अपने चैनल के जरिए आगे बढ़ाता है।
अध्ययन की मुख्य लेखिका दीप्ति धूसिया ने बताया कि शोध का उद्देश्य Rv0191 और पायराज़िनामाइड के बीच आणविक स्तर पर होने वाली प्रक्रिया को समझना था। उनके मुताबिक, ट्रांसपोर्टर अपना आकार किस तरह बदलता है और दवा को किस तरह आगे ले जाता है, इसे समझने से उसके काम को रोकने के संभावित बिंदुओं की पहचान की जा सकती है।
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दवा प्रतिरोध को देखने का नया नजरिया
संबंधित लेखक डॉ. युसूफ अख्तर के अनुसार, यह अध्ययन दवा प्रतिरोध को एक अलग दृष्टिकोण से समझने में मदद करता है। उनके मुताबिक, सवाल केवल यह नहीं है कि कोई दवा किसी प्रोटीन से जुड़ती है या नहीं, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि जुड़ने के बाद प्रोटीन में क्या बदलाव होता है और वह दवा को प्रभावी तरीके से आगे ले जाने में सक्षम है या नहीं।
शोधकर्ताओं ने अपने कंप्यूटेशनल निष्कर्षों को अंतिम प्रमाण के बजाय एक क्रियाविधि संबंधी ढांचे और परिकल्पना विकसित करने वाले आधार के रूप में पेश किया है। उनका कहना है कि अब इन निष्कर्षों को प्रयोगशाला में होने वाले आगे के अध्ययनों के जरिए जांचा जा सकता है।
दवा-प्रतिरोधी टीबी के बीच क्यों अहम है यह शोध
दवा-प्रतिरोधी टीबी भारत समेत दुनिया के सामने एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनी हुई है। वैश्विक स्वास्थ्य संगठन की 2025 की टीबी रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में दुनिया भर में बहु-औषधि-प्रतिरोधी और रिफैम्पिसिन-प्रतिरोधी टीबी के कारण अनुमानित 1.50 लाख मौतें हुईं। वर्ष 2015 के बाद MDR/RR-TB के नए मामलों में धीरे-धीरे कमी आई है, लेकिन यह प्रगति ‘एंड टीबी स्ट्रैटेजी’ के लक्ष्यों से अभी काफी पीछे है।
भारत पर इस बीमारी का बड़ा बोझ है। वर्ष 2024 में वैश्विक स्तर पर MDR/RR-TB से प्रभावित लोगों में भारत की अनुमानित हिस्सेदारी 32 प्रतिशत थी। इसी वर्ष दवा-प्रतिरोधी टीबी का उपचार शुरू करने वाले मरीजों में लगभग 71 प्रतिशत का ही सफल इलाज हो सका। यह स्थिति बताती है कि आधुनिक उपचार विकल्पों के बावजूद दवा-प्रतिरोधी टीबी का इलाज अब भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
इलाज की अवधि घटी, फिर भी प्रतिरोध बड़ी चुनौती
भारत में 2015 से 2024 के बीच टीबी से होने वाली समग्र मृत्यु दर प्रति एक लाख आबादी पर 28 से घटकर 21 हुई है। इसके बावजूद भारत दुनिया भर में होने वाली टीबी मौतों में लगभग एक-चौथाई हिस्सेदारी रखता है। यह हिस्सा मुख्य रूप से देश में टीबी के कुल बोझ को दर्शाता है।
BPaLM जैसी नई पूरी तरह मौखिक उपचार पद्धतियों ने MDR-TB के इलाज की अवधि को पहले के 18 से 24 महीनों से घटाकर करीब छह महीने कर दिया है। हालांकि, आनुवंशिक बदलाव, दवाओं के बदले हुए लक्ष्य और इफ्लक्स के जरिए दवा को बाहर निकालने जैसी प्रक्रियाएं उपचार की प्रभावशीलता को प्रभावित करती हैं।
मौजूदा दवाओं को ज्यादा प्रभावी बनाने की उम्मीद
बीबीएयू टीम के शोध का महत्व इस बात में है कि यह दवा को बदलने के बजाय उस प्रक्रिया को निशाना बनाने की संभावित दिशा दिखाता है, जिसके जरिए बैक्टीरिया दवा को अपनी कोशिका से बाहर निकाल सकता है। यदि आगे के प्रयोगात्मक अध्ययनों में Rv0191 की भूमिका और PZA के इफ्लक्स से इसका संबंध पुष्ट होता है, तो भविष्य में इस ट्रांसपोर्टर की गतिविधि को रोकने वाली रणनीतियों पर काम किया जा सकता है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, परिवहन प्रक्रिया में शामिल आणविक विशेषताओं की पहचान भविष्य में इफ्लक्स में हस्तक्षेप करने वाले अणुओं के विकास के लिए शुरुआती आधार दे सकती है। टीम ने स्पष्ट किया है कि अभी इस दिशा में प्रयोगात्मक शोध की जरूरत है।
कुलपति ने शोध टीम को दी बधाई
इस अध्ययन को रोगाणुरोधी प्रतिरोध के आणविक आधार को समझने वाले शोध की कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। यह शोध यह भी दिखाता है कि कंप्यूटेशनल जीव विज्ञान उन आणविक प्रक्रियाओं को समझने में प्रयोगात्मक शोध का पूरक बन सकता है, जिन्हें केवल प्रयोगशाला में पकड़ना मुश्किल हो सकता है।
बीबीएयू के कुलपति प्रो. आरके मित्तल और स्कूल की डीन प्रो. संगीता सक्सेना ने शोध दल को बधाई दी। उन्होंने टीम के प्रयासों की सराहना करते हुए भविष्य में भी इस तरह के उपयोगी शोध को जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया।

