भारतीय ज्ञान प्रणाली और सुशासन से सतत विकास पर मंथन, विकसित भारत@2047 के लक्ष्य पर राष्ट्रीय संगोष्ठी

लखनऊ: नेशनल पीजी कॉलेज, लखनऊ में उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा परिषद के प्रायोजन से “भारतीय ज्ञान प्रणाली एवं सुशासन के माध्यम से सतत विकास के मार्ग” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें प्रशासकों, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, विद्वानों और विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया। संगोष्ठी में वर्ष 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने में भारतीय ज्ञान प्रणाली, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, स्वदेशी नवाचार, उद्यमिता, सतत विकास और सुशासन की भूमिका पर चर्चा हुई।

आधुनिक विज्ञान के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा के समन्वय पर जोर
महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. देवेंद्र कुमार सिंह ने कहा कि विकसित भारत की परिकल्पना संतुलित और सतत विकास मॉडल पर आधारित होनी चाहिए। इसमें भारत की समृद्ध बौद्धिक एवं सांस्कृतिक विरासत के साथ आधुनिक विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार का समन्वय जरूरी है। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक कल्याण, सांस्कृतिक मूल्यों और उत्तरदायी शासन जैसी चुनौतियों के समाधान में भारतीय ज्ञान प्रणाली की उपयोगिता पर प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि सतत विकास का अर्थ केवल आर्थिक समृद्धि नहीं है, बल्कि आर्थिक विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक न्याय और नैतिक सुशासन का संतुलन भी आवश्यक है। उन्होंने विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, नवाचार, उद्यमिता और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करने को समय की आवश्यकता बताया।
शिक्षा और नवाचार को विकसित भारत की बुनियाद बताया
संगोष्ठी का उद्घाटन मुख्य अतिथि के. विजय कुमार, आईपीएस सेवानिवृत्त एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक ने किया। उन्होंने प्राचीन भारत की धातुकर्म, व्यापार, स्वदेशी मापन प्रणाली, शिक्षा और वैज्ञानिक चिंतन के क्षेत्र में उपलब्धियों पर चर्चा की। पुरातात्विक साक्ष्यों और प्राचीन व्यापारिक मार्गों का उल्लेख करते हुए उन्होंने भारत की प्राचीन आर्थिक एवं तकनीकी प्रगति को रेखांकित किया।
उन्होंने नालंदा को प्राचीन विश्व के महत्वपूर्ण वैश्विक ज्ञान केंद्रों में शामिल बताते हुए जिज्ञासा, मार्गदर्शन, आजीवन सीखने और ज्ञान की निरंतर खोज के महत्व पर जोर दिया। अपने 37 वर्षों के सार्वजनिक सेवा अनुभव का उल्लेख करते हुए उन्होंने विद्यार्थियों से सत्य और ज्ञान के अन्वेषक बनने तथा वैज्ञानिक नवाचार एवं राष्ट्र निर्माण में सक्रिय योगदान देने का आह्वान किया।
युवाओं से रोजगार सृजन की दिशा में आगे बढ़ने का आह्वान
मुख्य वक्ता प्रो. औधेश कुमार ने कहा कि युवा और विद्यार्थी भारत के भविष्य के प्रमुख निर्माता हैं। उन्होंने शिक्षा को केवल रटने की पद्धति तक सीमित रखने के बजाय कौशल विकास, उद्यमिता, आत्मनिर्भरता और व्यावहारिक शिक्षा से जोड़ने की आवश्यकता बताई।
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उन्होंने विद्यार्थियों को रोजगार प्राप्त करने के साथ रोजगार सृजन की दिशा में भी आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। प्रो. कुमार ने भारतीय पारंपरिक ज्ञान और प्रथाओं की वर्तमान समय में उपयोगिता पर चर्चा करते हुए उनके वैज्ञानिक एवं पर्यावरणीय पहलुओं के अध्ययन की आवश्यकता बताई।
सामाजिक न्याय और सुशासन के साथ सतत विकास पर जोर
प्रो. औधेश कुमार ने विकसित भारत@2047 की परिकल्पना को रामराज्य के आदर्शों और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की भावना से जोड़ते हुए समृद्धि, सामाजिक सद्भाव, न्याय और जनकल्याण पर आधारित समाज की कल्पना प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि सतत विकास के लिए सामाजिक न्याय, सांस्कृतिक मूल्य, पर्यावरण संरक्षण, आर्थिक समृद्धि और सुशासन का समन्वय आवश्यक है।
संगोष्ठी में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि भारत की पारंपरिक ज्ञान परंपरा और आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान के बीच सार्थक समन्वय स्थापित करके ही सतत और समावेशी विकास का मार्ग तैयार किया जा सकता है।
संगोष्ठी के समापन पर जताया आभार
कार्यक्रम के अंत में प्रो. राकेश पाठक ने आभार व्यक्त किया। उन्होंने मुख्य अतिथि, मुख्य वक्ता, प्राचार्य, विशिष्ट अतिथियों, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, प्रतिनिधियों, शिक्षकों और छात्र स्वयंसेवकों के प्रति आभार जताया तथा संगोष्ठी की सफलता में उनके योगदान की सराहना की।
संगोष्ठी के माध्यम से नेशनल पीजी कॉलेज, लखनऊ की भारतीय ज्ञान प्रणाली, सतत विकास, नवाचार, अनुसंधान और सुशासन को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता सामने आई। कार्यक्रम में विद्यार्थियों और युवा शोधकर्ताओं को विकसित भारत@2047 के निर्माण में सार्थक योगदान के लिए प्रेरित किया गया।

