बीबीएयू के वैज्ञानिकों को बड़ी सफलता, ल्यूपस से जुड़ी गंभीर किडनी बीमारी के इलाज के लिए नए दवा यौगिक को मिला भारतीय पेटेंट

लखनऊ: बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू) के शोधकर्ताओं ने चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए ल्यूपस नेफ्राइटिस जैसी गंभीर किडनी बीमारी के संभावित उपचार के लिए विकसित एक नए दवा यौगिक का भारतीय पेटेंट प्राप्त किया है। यह उपलब्धि विश्वविद्यालय के जैव प्रौद्योगिकी और रसायन विज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों के संयुक्त शोध का परिणाम है।

विश्वविद्यालय के जैव प्रौद्योगिकी विभाग के डॉ. यूसुफ अख्तर, उनकी पीएचडी शोधार्थी डॉ. गरिमा सिंह तथा रसायन विज्ञान विभाग के डॉ. जवाहरलाल जाट को यह पेटेंट प्रदान किया गया है। इस अवसर पर कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने शोध दल को बधाई देते हुए इसे विश्वविद्यालय के लिए गौरवपूर्ण उपलब्धि बताया।
उन्नत तकनीक से खोजा गया संभावित दवा यौगिक
शोधकर्ताओं ने अत्याधुनिक कम्प्यूटेशनल ड्रग डिस्कवरी तकनीक का उपयोग करते हुए 1.55 लाख से अधिक दवा-सदृश यौगिकों का विश्लेषण किया। विस्तृत परीक्षण और विभिन्न वैज्ञानिक मानकों पर मूल्यांकन के बाद FRP-024 नामक यौगिक को सबसे प्रभावी और सुरक्षित उम्मीदवार के रूप में चुना गया।
इसके बाद वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में इस यौगिक का सफल संश्लेषण किया और जैविक परीक्षणों के माध्यम से इसकी प्रभावशीलता एवं सुरक्षा का मूल्यांकन किया। शोधकर्ताओं का दावा है कि पारंपरिक रूप से कई वर्षों में पूरा होने वाला यह शोध कार्य आधुनिक कम्प्यूटेशनल तकनीकों की मदद से अपेक्षाकृत कम समय में संभव हो सका।

ल्यूपस नेफ्राइटिस के इलाज में नई उम्मीद
ल्यूपस नेफ्राइटिस सिस्टेमिक ल्यूपस एरिथेमेटोसस (एसएलई) की एक गंभीर जटिलता है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली किडनी पर हमला करने लगती है। समय पर उपचार न मिलने पर यह स्थिति किडनी फेल होने और मृत्यु तक का कारण बन सकती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, दुनिया भर में लाखों लोग ल्यूपस से प्रभावित हैं और महिलाओं में यह बीमारी पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक पाई जाती है। भारत में भी यह बीमारी युवा महिलाओं के लिए गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बनी हुई है।
सूजन को 85 प्रतिशत तक कम करने का दावा
शोध के दौरान पाया गया कि FRP-024 नामक यौगिक BST-2 प्रोटीन को लक्षित करता है, जो ल्यूपस नेफ्राइटिस में सूजन और किडनी क्षति की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रयोगशाला अध्ययनों में इस यौगिक ने सूजन से जुड़े संकेतकों को 85 प्रतिशत तक कम किया और किसी प्रकार के विषाक्त प्रभाव के संकेत नहीं मिले।
स्टेरॉयड पर निर्भरता घटाने में भी मिल सकती है मदद
शोधकर्ताओं का कहना है कि FRP-024 मौजूदा स्टेरॉयड आधारित उपचार के साथ मिलकर बेहतर परिणाम दे सकता है। इससे रोगियों को कम मात्रा में स्टेरॉयड लेने की आवश्यकता पड़ सकती है, जिससे दवाओं के गंभीर दुष्प्रभावों में कमी आने की संभावना है।
मानव परीक्षण से पहले कई चरण बाकी
हालांकि शुरुआती प्रयोगशाला परिणाम उत्साहजनक हैं, लेकिन इस दवा यौगिक को मरीजों के उपचार में शामिल करने से पहले व्यापक पशु परीक्षण और मानव नैदानिक परीक्षणों से गुजरना होगा। इसके बावजूद पेटेंट प्राप्त होना और प्रारंभिक परीक्षणों में सकारात्मक परिणाम मिलना इस शोध को चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
विश्वविद्यालय में खुशी का माहौल
इस उपलब्धि पर विश्वविद्यालय के शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने शोध दल को शुभकामनाएं दीं। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में यह शोध ल्यूपस नेफ्राइटिस से जूझ रहे मरीजों के लिए अधिक सुरक्षित और लक्षित उपचार विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
