उत्तराखंड के मदरसों में अब तालीम के साथ संस्कार भी, ईद-मुहर्रम पर हिंदू-मुस्लिम मिलकर देंगे भाईचारे का संदेश
देहरादून: उत्तराखंड के मदरसों में धार्मिक शिक्षा के साथ अब बच्चों को भाईचारे, समाज सेवा और सामाजिक जिम्मेदारी की सीख भी दी जाएगी। मदरसों में पाठ्यक्रम के तहत इन विषयों पर नए अध्याय जोड़े गए हैं। इसके अलावा ईद, बकरीद और मुहर्रम जैसे अवसरों पर होने वाले आयोजनों में सभी वर्गों के लोगों को आमंत्रित किया जाएगा। उद्देश्य बच्चों में शिक्षा के साथ सामाजिक सरोकार और आपसी भाईचारे की भावना विकसित करना है।
मदरसों में बच्चों को अच्छे कार्यों के लिए प्रोत्साहित करने की भी पहल की जा रही है। इसके लिए ‘शुक्र की डायरी’ तैयार की जाएगी। इसमें विद्यार्थी अपने किए गए अच्छे कामों का उल्लेख करेंगे। बच्चे लिखेंगे कि उन्होंने किसकी मदद की, कौन सा नेक काम किया और समाज के लिए उन्होंने क्या योगदान दिया।

हिंदी और उर्दू में होंगी वाद-विवाद प्रतियोगिताएं
मदरसों में अब उर्दू के साथ हिंदी भाषा में भी वाद-विवाद प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएंगी। इसके पीछे उद्देश्य विद्यार्थियों में संवाद करने, दूसरों के विचारों को समझने और अपनी बात प्रभावी तरीके से रखने की क्षमता विकसित करना है। इसके जरिए बच्चों को सामाजिक और व्यवहारिक विषयों पर अपनी राय रखने का अवसर भी मिलेगा।
ईद और मुहर्रम के आयोजनों में सभी वर्गों को बुलाने की तैयारी
मदरसों में ईद, बकरीद और मुहर्रम के अवसर पर होने वाले कार्यक्रमों में हिंदू-मुस्लिम समेत सभी वर्गों के लोगों को आमंत्रित किया जाएगा। इसके जरिए समाज में आपसी मेलजोल और भाईचारे का संदेश देने की कोशिश की जाएगी। संबंधित व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि मदरसों से शिक्षा हासिल करने वाले बच्चे समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भी समझें।
452 मदरसों में सिर्फ 60 ने मांगी मान्यता

उत्तराखंड में पहले मदरसा बोर्ड से 452 मदरसे मान्यता प्राप्त थे। 30 जून को मदरसा बोर्ड भंग होने के बाद अब इन संस्थानों को अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के तहत संचालित किया जाना है। हालांकि करीब डेढ़ महीने बाद भी शिक्षा विभाग के पास मान्यता के लिए सिर्फ 60 मदरसों के आवेदन पहुंचे हैं।
अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के अध्यक्ष डॉ. सुरजीत सिंह गांधी के मुताबिक, मदरसा संचालकों को मान्यता लेने के लिए लगातार कहा जा रहा है। जो संचालक मान्यता के लिए तैयार नहीं हैं और बिना अनुमति बच्चों को दाखिला देकर मदरसे चला रहे हैं, उनके संबंध में शासन को रिपोर्ट भेजी जा रही है। उन्होंने बताया कि सोमवार तक रिपोर्ट भेज दी जाएगी।
सिर्फ तालीम नहीं, संस्कार भी जरूरी
अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण की ओर से मदरसा संचालकों को मान्यता लेने के लिए कहा जा रहा है। अधिकारियों के मुताबिक बच्चों के पाठ्यक्रम को आधुनिक शिक्षा, व्यवहारिक ज्ञान और भाईचारे की भावना को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। जोर इस बात पर है कि बच्चों को केवल किताबी और धार्मिक शिक्षा तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उनमें अच्छे संस्कार और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना भी विकसित की जाए।
