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World Sepsis Day 2026: सेप्सिस से हर 3 सेकंड में एक मौत, यूपी में एंटीबायोटिक के सही इस्तेमाल की बनेगी राज्य नीति

लखनऊ: विश्व सेप्सिस दिवस के मौके पर किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग ने सेप्सिस को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। 13 सितंबर को मनाए जाने वाले विश्व सेप्सिस दिवस 2026 की थीम “सेप्सिस में निवेश करें – जानें बचाएं” रखी गई है। इस अवसर पर उत्तर प्रदेश में एंटीबायोटिक्स के विवेकपूर्ण इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए जल्द राज्य स्तरीय नीति बनाने की बात कही गई है।

सेप्सिस एक गंभीर और जानलेवा स्थिति है, जिसमें संक्रमण के प्रति शरीर की प्रतिक्रिया व्यापक सूजन और ऊतकों को नुकसान पहुंचा सकती है। विशेषज्ञों ने इसके मामलों में समय पर पहचान और उपचार को बेहद महत्वपूर्ण बताया है। सही एंटीबायोटिक, सही खुराक और सही समय पर उपचार से कई मरीजों की जान बचाई जा सकती है।

सेप्सिस का बढ़ता खतरा, हर मिनट की देरी पड़ सकती है भारी

प्रेस विज्ञप्ति में दिए आंकड़ों के मुताबिक सेप्सिस से हर 3 सेकंड में एक व्यक्ति की मौत होती है और हर साल दुनिया में करीब 4 करोड़ 89 लाख लोग इससे प्रभावित होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर साल लगभग 1 करोड़ 10 लाख लोगों की मौत सेप्सिस के कारण होती है। भारत में भी सेप्सिस के करीब 1 करोड़ 10 लाख मामले और लगभग 30 लाख मौतों का अनुमान बताया गया है।

दस्तावेज के अनुसार एंटीबायोटिक उपचार में हर घंटे की देरी से मृत्यु का खतरा 0.4 प्रतिशत से 7 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। भारत में सेप्सिस से मृत्यु दर लगभग 213 प्रति एक लाख लोगों की बताई गई है। हाल की एक स्टडी के मुताबिक भारत में आईसीयू में भर्ती आधे से अधिक मरीज सेप्सिस से प्रभावित हैं और इनमें 45 प्रतिशत तक मामले मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट बैक्टीरिया से जुड़े बताए गए हैं।

एंटीबायोटिक के गलत इस्तेमाल पर सख्ती की जरूरत

कार्यक्रम में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस को बड़ी वैश्विक चुनौती बताया गया। विशेषज्ञों के मुताबिक एंटीबायोटिक्स का अंधाधुंध या गलत इस्तेमाल दवा-प्रतिरोधी संक्रमण को बढ़ावा दे सकता है। इसी वजह से स्वास्थ्य व्यवस्था में एंटीबायोटिक्स के इस्तेमाल को नियंत्रित करने के लिए राज्य स्तर पर ठोस कदम उठाने की जरूरत पर जोर दिया गया।

अपर मुख्य सचिव चिकित्सा स्वास्थ्य, परिवार कल्याण एवं चिकित्सा शिक्षा डॉ. अमित कुमार घोष ने एंटीबायोटिक्स को लेकर एक समान और सख्त राज्य नीति की आवश्यकता बताई। उन्होंने बिना चिकित्सकीय सलाह के एंटीबायोटिक लेने और ड्रग-रेसिस्टेंट जीवों के पनपने से बचने पर जोर दिया।

सेप्सिस के ये लक्षण दिखें तो तुरंत सतर्क हों

सेप्सिस तेजी से गंभीर रूप ले सकता है। इसके प्रमुख संकेतों में बुखार या शरीर का तापमान कम होना, हृदय गति बढ़ना, तेजी से सांस लेना, सांस फूलना, भ्रम या मानसिक स्थिति में बदलाव और निम्न रक्तचाप शामिल हैं।

इसके बढ़ने पर पेशाब कम होना, पेट में दर्द, पीलिया, खून के थक्के बनने की समस्या और त्वचा का पीला, नीला या धब्बेदार दिखाई देना जैसे लक्षण सामने आ सकते हैं। कुछ मरीजों को मतली, उल्टी, दस्त या पेट संबंधी परेशानी भी हो सकती है। गंभीर स्थिति में सेप्सिस सेप्टिक शॉक और कई अंगों के काम करना बंद करने तक पहुंच सकता है।

किन संक्रमणों से हो सकता है सेप्सिस?

सेप्सिस का सबसे आम कारण जीवाणु संक्रमण बताया गया है। मूत्र मार्ग संक्रमण, निमोनिया, त्वचा और नरम ऊतकों का संक्रमण, पेट का संक्रमण तथा रक्तप्रवाह का संक्रमण इसके संभावित स्रोत हो सकते हैं। गंभीर वायरल और फंगल संक्रमण भी सेप्सिस का कारण बन सकते हैं।

मलेरिया जैसे परजीवी संक्रमण, अस्पताल में होने वाले संक्रमण, सर्जरी, कैथेटर और वेंटिलेटर से जुड़े संक्रमण भी इसके जोखिम को बढ़ा सकते हैं। कमजोर प्रतिरक्षा वाले लोग, बुजुर्ग, मधुमेह, क्रॉनिक किडनी रोग और सीओपीडी जैसी पुरानी बीमारियों से जूझ रहे मरीज भी अधिक जोखिम में हो सकते हैं।

जांच में क्लीनिकल मूल्यांकन से लेकर लैब टेस्ट तक जरूरी

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सेप्सिस की पहचान के लिए मरीज की चिकित्सकीय स्थिति, लक्षण और संभावित संक्रमण का आकलन किया जाता है। इसके साथ रक्त जांच और दूसरे प्रयोगशाला परीक्षण किए जाते हैं। सीबीसी, सी-रिएक्टिव प्रोटीन और प्रोकैल्सीटोनिन जैसे सूजन संबंधी संकेतकों की जांच की जा सकती है।

संक्रमण के स्रोत का पता लगाने के लिए छाती का एक्स-रे या सीटी स्कैन जैसी इमेजिंग जांच की जा सकती है। रक्त, मूत्र, थूक या अन्य शारीरिक तरल पदार्थों की जांच से संक्रमण पैदा करने वाले रोगजनक की पहचान करने में मदद मिलती है। कुछ आणविक जांच एक ही नमूने से कई रोगजनकों और एंटीबायोटिक प्रतिरोध से जुड़े जीन का तेजी से पता लगाने में मदद कर सकती हैं।

इलाज में शुरुआती हस्तक्षेप बेहद अहम

सेप्सिस के प्रबंधन में सबसे पहले इसकी जल्द पहचान और तेजी से उपचार शुरू करना महत्वपूर्ण है। संक्रमण के स्रोत को नियंत्रित करने के लिए जरूरत के अनुसार संक्रमित ऊतक या फोड़े को हटाने जैसी प्रक्रिया की जा सकती है।

मरीज का रक्तचाप बनाए रखने के लिए उचित दवाओं का इस्तेमाल, संक्रमण के लिए ब्रॉड-स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक्स, ऑक्सीजन थेरेपी और जरूरत पड़ने पर यांत्रिक वेंटिलेशन दिया जा सकता है। गंभीर स्थिति में अंगों को सहारा देने के लिए डायलिसिस या हृदय संबंधी दवाओं की जरूरत पड़ सकती है। रक्त ग्लूकोज नियंत्रण और कुछ मामलों में कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स का इस्तेमाल भी उपचार का हिस्सा हो सकता है।

KGMU में दो दिवसीय सेप्सिस कॉन्फ्रेंस का आयोजन

विश्व सेप्सिस दिवस के अवसर पर KGMU के पल्मोनरी और क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग ने 12 और 13 सितंबर 2026 को दो दिवसीय कॉन्फ्रेंस आयोजित की। कार्यक्रम पल्मोक्रिट फाउंडेशन की देखरेख में सोसाइटी ऑफ प्रिसिजन मेडिसिन एंड इंटेंसिव केयर तथा नेशनल एकेडमी ऑफ मेडिकल साइंसेज के उत्तर प्रदेश चैप्टर के सहयोग से आयोजित किया गया। इसका उद्देश्य स्वास्थ्यकर्मियों के बीच सेप्सिस प्रबंधन को लेकर जागरूकता बढ़ाना और बेहतर उपचार पद्धतियों को बढ़ावा देना था।

उद्घाटन समारोह में अपर मुख्य सचिव डॉ. अमित कुमार घोष मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। KGMU की कुलपति प्रो. डॉ. सोनिया नित्यानंद मुख्य संरक्षक रहीं। RMLIMS लखनऊ के पूर्व निदेशक डॉ. दीपक मालवीय गेस्ट ऑफ ऑनर के तौर पर मौजूद रहे। AIIMS पटना के पूर्व निदेशक डॉ. जीके सिंह, KGMU के डीन एकेडमिक्स प्रो. डॉ. वीरेंद्र अतम और पैरामेडिकल संकाय के डीन प्रो. केके सिंह समेत कई विशेषज्ञ कार्यक्रम में शामिल हुए।

विशेषज्ञों ने सेप्सिस के इलाज के अलग-अलग पहलुओं पर की चर्चा

कॉन्फ्रेंस में डॉ. सौमित्र मिश्रा ने 2026 के नए सेप्सिस अभियान पर चर्चा की। डॉ. यश जावेरी ने शुरुआती रिससिटेशन और फ्लूइड मैनेजमेंट, जबकि डॉ. आर.के. सिंह ने सेप्सिस की शुरुआती पहचान और निदान पर जानकारी दी।

डॉ. दीपक मालवीय ने सेप्सिस की परिभाषा और महामारी विज्ञान पर चर्चा की। डॉ. विमला वेंकटेश ने मौजूदा डायग्नोस्टिक तरीकों, डॉ. अतहर जमाल ने बच्चों में एंटीमाइक्रोबियल थेरेपी और डॉ. राहुल कांजीलाल ने सेप्टिक शॉक में इनोट्रोप्स और प्रेसर्स के इस्तेमाल पर जानकारी दी।

इसके अलावा डॉ. आरएएस कुशवाहा ने सेप्सिस और निमोनिया, डॉ. विशाल पूनिया ने सेप्सिस में एक्यूट किडनी इंजरी, डॉ. एसके सोनकर ने कमजोर प्रतिरक्षा वाले मरीजों में सेप्सिस और डॉ. संजय सुरेखा ने यूरोसेप्सिस के निदान एवं प्रबंधन पर चर्चा की। डॉ. वेद प्रकाश ने दवा-प्रतिरोधी जीवों के प्रबंधन और डॉ. उमेश चंद्र त्रिपाठी ने सेप्सिस में कार्डियोमायोपैथी के प्रबंधन की जानकारी दी।

KGMU की क्रिटिकल केयर यूनिट में बेहतर परिणाम का दावा

विभाग की ओर से बताया गया कि सेप्सिस मामलों के प्रबंधन में विभाग ने विशेष पहचान बनाई है। भारत की सबसे बड़ी श्वसन गहन चिकित्सा इकाई के तौर पर बताई गई इस सुविधा में 26 आईसीयू बेड हैं। विभाग के अनुसार यहां वेंटिलेटर-एसोसिएटेड निमोनिया की दर 10 प्रतिशत से कम है और करीब 85 प्रतिशत मरीजों के ठीक होने का उल्लेख किया गया है।

 

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