पी एच डी कोर्स वर्क में दिल्ली विश्वविद्यालय एवं जामिया मिलिया इस्लामिया के विद्वानों ने दिए व्याख्यान

बरेली,12 सितम्बर। शिक्षा विभाग , महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखण्ड यूनिवर्सिटी, बरेली में आयोजित पीएचडी कोर्सवर्क के प्रथम सत्र के दौरान दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर गौरव राव ने शोधार्थियों से शोध से संबंधित साहित्य का संकलन किस प्रकार किया जाना चाहिए , इस विषय में चर्चा की। उन्होंने बताया कि किसी भी उच्च स्तरीय अनुसंधान की शुरुआत एक व्यवस्थित संदर्भ-साहित्य संकलन से होती है। इसके बिना शोधार्थी अपने अध्ययन के वास्तविक ‘ज्ञान-अंतराल’ की पहचान नहीं कर सकते। उन्होंने शोधार्थियों को निर्देशित किया कि वे केवल सतही जानकारी तक सीमित न रहें, बल्कि प्राथमिक और प्रामाणिक स्रोतों का गहन अध्ययन करें। इसके साथ ही उन्होंने साहित्य संकलन के लिए आवश्यक विभिन्न प्रकार के पाठ्य साहित्य एवं डिजिटल संसाधनों की भी जानकारी दी। प्रोफेसर राव ने पारंपरिक पाठ्य संसाधनों और आधुनिक डिजिटल संसाधनों के संतुलन को आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि जहाँ विश्वविद्यालय के पुस्तकालय, मुद्रित संदर्भ ग्रंथ और ऐतिहासिक अभिलेखागार शोध को सैद्धांतिक गहराई देते हैं, वहीं ‘शोध-गंगा’, ‘ई-शोध-सिंधु’, JSTOR और ‘स्कोपस’ जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म वैश्विक स्तर पर हो रहे समकालीन अध्ययनों तक त्वरित पहुँच सुनिश्चित करते हैं। द्वितीय सत्र में विभाग के प्रोफेसर सुधीर कुमार वर्मा ने शोधार्थियों को उच्च शिक्षा से सम्बंधित विभिन्न मुद्दों से अवगत कराया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार सामाजिक संरचना उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करती है तथा साथ ही साथ शैक्षिक समानता, समावेशन, विविधिता आदि पहलुओं पर चर्चा की। उन्होंने अपने व्याख्यान की शुरुआत उच्च शिक्षा के वर्तमान परिदृश्य से की। उन्होंने कहा कि आज उच्च शिक्षण संस्थानों का मुख्य दायित्व केवल उपाधियाँ बाँटना नहीं, बल्कि अकादमिक गुणवत्ता, समता, विविधता और समावेशन को धरातल पर उतारना है। जब तक समाज के प्रत्येक वर्ग के विद्यार्थी को निष्पक्ष अवसर और अनुसंधान के आधुनिक संसाधन नहीं मिलेंगे, तब तक ज्ञान-आधारित समाज का निर्माण संभव नहीं है। अंतिम सत्र में जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी, दिल्ली के प्रोफेसर कौशल किशोर ने शोध परिकल्पना की अवधारणा एवं प्रकारों के विषय में विस्तारपूर्वक चर्चा की। शोध प्रक्रिया पर विस्तार से चर्चा करते हुए उन्होंने परिकल्पना के निर्माण को अनुसंधान की रीढ़ बताया। उन्होंने बताया कि एक स्पष्ट, तार्किक और परीक्षण-योग्य परिकल्पना ही शोध की दिशा तय करती है। बिना सटीक परिकल्पना के किया गया शोध अपनी प्रासंगिकता खो देता है। शोधार्थियों को परिकल्पना निर्माण और शोध प्रारूप के चयन से जुड़े तकनीकी बिंदुओं से अवगत करते हुए उन्होंने कहा कि परिकल्पना अनुसंधान का दिशा-सूचक यंत्र होती है। उन्होंने शून्य परिकल्पना, वैकल्पिक परिकल्पना, और दिशात्मक एवं अदिशात्मक परिकल्पनाओं के अंतर को भी स्पष्ट किया।उन्होंने शोधार्थियों के प्रश्नों का समाधान करते हुए गुणात्मक एवं मात्रात्मक शोध के विषय पर भी प्रकाश डाला।सत्र के समापन पर शोधार्थियों की जिज्ञासाओं का समाधान किया गया। व्याख्यान माला में एम. एड. एवं शोधार्थी भी शामिल रहे।कोर्सवर्क की समन्वयक प्रो संतोष अरोरा एवं उप समन्वयक डॉ प्रतिभा सागर ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
बरेली से अखिलेश चन्द्र सक्सेना की रिपोर्ट

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