BBAU की शोधार्थी ने कर दिखाया कमाल! रोशिनी बजाज की अनोखी पहल से शुरू हुआ कम्पोस्टिंग स्टेशन, ‘जीरो वेस्ट कैंपस’ बनने की ओर बड़ा कदम

लखनऊ : बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू) में पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल को नई पहचान मिली है। विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग और नवकल्पना, बीबीएयू के संयुक्त तत्वावधान में ग्रीन हाउस के पीछे स्थापित कम्पोस्टिंग एवं वर्मी-कम्पोस्टिंग स्टेशन का उद्घाटन किया गया। इस अभिनव परियोजना की शुरुआत पर्यावरण विज्ञान विभाग की शोधार्थी रोशिनी बजाज ने अपने मार्गदर्शक डॉ. जीवन सिंह और प्रो. शिखा के निर्देशन में की है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने की। इस दौरान प्रो. के.के. पांडेय, प्रो. मनोज जोशी, डॉ. अमोद सिंह और प्रो. नवीन कुमार अरोड़ा सहित विश्वविद्यालय के कई वरिष्ठ शिक्षाविद मौजूद रहे। कुलपति ने फीता काटकर कम्पोस्टिंग एवं वर्मी-कम्पोस्टिंग स्टेशन का उद्घाटन किया। समारोह के दौरान शोधार्थी रोशिनी बजाज ने वर्मी-कम्पोस्टिंग इकाई में तैयार की गई वर्मी खाद का नमूना कुलपति को भेंट किया।
रोशिनी बजाज की पहल बनी छात्रों के लिए प्रेरणा
कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने इस नवाचार की सराहना करते हुए कहा कि रोशिनी बजाज द्वारा शुरू की गई यह पहल विश्वविद्यालय के अन्य विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए प्रेरणादायक उदाहरण है। उन्होंने कहा कि सीमित संसाधनों के बावजूद नवाचार, समर्पण और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर बड़े लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं।
उन्होंने विद्यार्थियों को नवाचार और उद्यमिता की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल शिक्षा प्रदान करना नहीं, बल्कि युवाओं को रोजगार सृजक बनाना भी है।
स्टार्टअप मॉडल के रूप में विकसित करने की तैयारी
कुलपति ने इस परियोजना को व्यावसायिक स्तर तक विस्तार देने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि यदि इस परियोजना से तैयार उत्पादों को बाजार तक पहुंचाया जाए तो यह सतत उद्यमिता (सस्टेनेबल एंटरप्रेन्योरशिप) का एक आदर्श मॉडल बन सकता है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में इस तरह के नवाचार आधारित स्टार्टअप विकसित होने से संस्थान की पहचान अनुसंधान, नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा देने वाले अग्रणी विश्वविद्यालय के रूप में और मजबूत होगी।
2000 किलो पत्ती अपशिष्ट पर चल रही प्रक्रिया
कम्पोस्टिंग एवं वर्मी-कम्पोस्टिंग स्टेशन के प्रारंभिक चरण में चार सीमेंटेड कम्पोस्टिंग और वर्मी-कम्पोस्टिंग बिन, एक बांस आधारित वर्मी-रिएक्टर, दो उच्च गति वाले रोटरी ड्रम कम्पोस्टर और 10 एजीटेटेड पाइल्स/विंडरो की सुविधा विकसित की गई है।

वर्तमान में लगभग 2000 किलोग्राम पत्तियों के अपशिष्ट को परिपक्वता प्रक्रिया के तहत तैयार उत्पाद में परिवर्तित किया जा रहा है। विश्वविद्यालय परिसर में हर वर्ष करीब 10 हजार किलोग्राम पत्ती अपशिष्ट उत्पन्न होता है, जिसे वैज्ञानिक तरीके से उपयोग में लाने की दिशा में यह परियोजना अहम भूमिका निभाएगी।
‘जीरो वेस्ट कैंपस’ बनाने का लक्ष्य
करीब 250 एकड़ में फैले बीबीएयू परिसर को ‘शून्य अपशिष्ट परिसर’ यानी ‘जीरो वेस्ट कैंपस’ के रूप में विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके तहत परिसर में उत्पन्न होने वाले पत्ती अपशिष्ट का वर्मी-कम्पोस्टिंग के माध्यम से पुनर्चक्रण किया जाएगा, जिससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ जैविक खाद का उत्पादन भी संभव होगा।
विश्वविद्यालय प्रशासन के सहयोग की सराहना
इस अवसर पर कम्पोस्टिंग एवं वर्मी-कम्पोस्टिंग इकाई की स्थापना समिति ने विश्वविद्यालय प्रशासन और सक्षम प्राधिकारी के प्रति आभार व्यक्त किया। समिति ने बताया कि इस स्टार्टअप पहल को बढ़ावा देने के लिए बायोमास श्रेडर (चाफ कटर), ट्राइसाइकिल ट्रॉली रिक्शा तथा वर्मी-कम्पोस्टिंग बिन और रिएक्टरों के लिए शेड उपलब्ध कराया गया है।
कार्यक्रम में प्रॉक्टर प्रो. राम चंद्रा, पर्यावरण विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. वेंकटेश दत्ता, शिक्षकगण, गैर-शिक्षण अधिकारी एवं कर्मचारी, शोधार्थी तथा बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।
हरित भविष्य की ओर मजबूत कदम
विशेषज्ञों के अनुसार यह स्टार्टअप पहल नवाचार, उद्यमिता, इन्क्यूबेशन और सतत विकास का बेहतरीन उदाहरण है। यह परियोजना न केवल पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देगी, बल्कि युवाओं को हरित उद्यमिता की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर भी प्रदान करेगी।
