सज्जन कुमार: दिल्ली की सियासत के कभी थे बड़े चेहरे, 1984 के दंगों ने बदल दी पूरी राजनीतिक कहानी
नई दिल्ली: कांग्रेस के कद्दावर नेताओं में शामिल रहे सज्जन कुमार कभी दिल्ली की राजनीति में बेहद प्रभावशाली चेहरा माने जाते थे। 1970 के दशक में जमीनी कार्यकर्ता के तौर पर राजनीतिक सफर शुरू करने वाले सज्जन कुमार ने स्थानीय राजनीति से संसद तक का सफर तय किया। बाहरी दिल्ली के ग्रामीण और झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाकों में उनकी मजबूत पकड़ थी, जिसने उन्हें कांग्रेस के प्रमुख जननेताओं में स्थापित किया।
उन्होंने स्थानीय मुद्दों को समझकर और आम लोगों से सीधा संपर्क बनाकर पार्टी के भीतर अपना मजबूत आधार तैयार किया। लेकिन 1984 के सिख विरोधी दंगों में उनका नाम सामने आने के बाद उनके राजनीतिक जीवन की दिशा पूरी तरह बदल गई।

बाहरी दिल्ली में मजबूत पकड़ से संसद तक पहुंचे
सज्जन कुमार का राजनीतिक प्रभाव 1980 के दशक में तेजी से बढ़ा। 1980 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने बाहरी दिल्ली सीट से जीत हासिल कर पहली बार संसद में कदम रखा। उस समय बाहरी दिल्ली देश के सबसे बड़े लोकसभा क्षेत्रों में शामिल थी। यहां जाट, यादव, दलित और झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाली बड़ी आबादी थी।
संगठन पर मजबूत पकड़ और क्षेत्र के मतदाताओं के बीच प्रभाव के चलते सज्जन कुमार कांग्रेस के बड़े जननेता के रूप में उभरे। उन्होंने 1991 और फिर 2004 में भी बाहरी दिल्ली से लोकसभा चुनाव जीता और संसद पहुंचे।
1984 के सिख विरोधी दंगों में आया नाम
अक्टूबर 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में सिख विरोधी दंगे भड़क गए थे। दिल्ली कैंट के राजनगर इलाके में भी हिंसा हुई, जिसमें कई निर्दोष लोगों की जान गई।
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इन घटनाओं के दौरान हिंसक भीड़ को उकसाने और साजिश रचने के आरोपों में सज्जन कुमार का नाम सामने आया। इस आपराधिक मामले ने उनके लंबे और प्रभावशाली राजनीतिक करियर को गहरा झटका दिया। इसके बाद उनकी राजनीतिक सक्रियता और प्रभाव लगातार प्रभावित होता गया।
उम्रकैद के बाद कांग्रेस से दिया इस्तीफा
सज्जन कुमार के खिलाफ मामले में वर्षों तक कानूनी कार्यवाही चली। दिसंबर 2018 में हाईकोर्ट ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई। फैसले के बाद उन्हें कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देना पड़ा और जेल जाना पड़ा।
इस तरह 1970 के दशक में शुरू हुआ उनका राजनीतिक सफर, जो स्थानीय राजनीति से संसद तक पहुंचा और करीब चार दशक तक दिल्ली की सियासत में प्रभावी रहा, 1984 के दंगों से जुड़े मामले और उम्रकैद की सजा के बाद पूरी तरह बदल गया।


