8 साल तक रहा खूनी युद्ध, अब इराक में होंगी खामेनेई की अंतिम संस्कार की रस्में, बदले रिश्तों की दिखेगी बड़ी तस्वीर

नई दिल्ली: कभी आठ वर्षों तक भीषण युद्ध लड़ने वाले ईरान और इराक के रिश्ते अब पूरी तरह बदले हुए नजर आ रहे हैं। इस बदलाव की झलक ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार कार्यक्रम में भी दिखाई दे रही है। तय कार्यक्रम के अनुसार, ईरान में प्रारंभिक धार्मिक रस्मों के बाद उनके पार्थिव शरीर को इराक के पवित्र शिया शहर नजफ और कर्बला ले जाया जाएगा, जहां विशेष धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाएंगे।

आठ साल का युद्ध, जिसने बदल दिया था पश्चिम एशिया
ईरान और इराक के बीच वर्ष 1980 से 1988 तक चला युद्ध पश्चिम एशिया के सबसे विनाशकारी संघर्षों में गिना जाता है। उस समय इराक के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने 1979 की ईरानी इस्लामी क्रांति के बाद ईरान पर हमला किया था।
विश्लेषकों के अनुसार, इराक को आशंका थी कि ईरानी क्रांति का प्रभाव उसके शिया बहुल इलाकों तक पहुंच सकता है। इसके अलावा शत्त-अल-अरब जलमार्ग और सीमा विवाद भी दोनों देशों के बीच संघर्ष की बड़ी वजह बने। आठ वर्षों तक चले इस युद्ध में दोनों देशों को भारी जन-धन का नुकसान उठाना पड़ा और लाखों लोगों की जान चली गई। युद्ध के दौरान रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल के आरोप भी लगे थे।
ईरान से इराक तक होगा अंतिम यात्रा का कार्यक्रम
जानकारी के मुताबिक, 7 जुलाई को खामेनेई के पार्थिव शरीर को ईरान के धार्मिक शहर कोम ले जाया जाएगा, जहां अंतिम संस्कार से जुड़ी धार्मिक रस्में पूरी की जाएंगी।
इसके बाद 8 जुलाई को इराक के पवित्र शहर नजफ और कर्बला में विशेष धार्मिक कार्यक्रम आयोजित होंगे। इन आयोजनों में क्षेत्र के प्रमुख शिया धार्मिक नेताओं और सामाजिक प्रतिनिधियों के शामिल होने की संभावना जताई गई है। अंतिम चरण में खामेनेई को ईरान के मशहद शहर स्थित इमाम रजा के मकबरे के निकट सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा।

नजफ और कर्बला का शिया समुदाय में विशेष महत्व
नजफ और कर्बला दुनिया भर के शिया मुसलमानों के सबसे पवित्र धार्मिक स्थलों में गिने जाते हैं। किसी प्रमुख शिया धर्मगुरु के पार्थिव शरीर को इन शहरों में ले जाना केवल अंतिम संस्कार की परंपरा नहीं माना जाता, बल्कि इसे शिया धार्मिक विरासत और इमामों की परंपरा से भी जोड़ा जाता है।
बदले रिश्तों का प्रतीक माना जा रहा कार्यक्रम
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि खामेनेई के अंतिम संस्कार का यह कार्यक्रम ईरान और इराक के बीच समय के साथ बदले राजनीतिक और धार्मिक संबंधों का प्रतीक भी है।
आज इराक में कई प्रभावशाली शिया राजनीतिक और धार्मिक समूह सक्रिय हैं, जिनके ईरान से करीबी संबंध माने जाते हैं। ऐसे में यह अंतिम यात्रा केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे क्षेत्रीय राजनीति और शिया समुदाय में ईरान की भूमिका के नजरिए से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
